
पेटलावद । विजयादशमी के अवसर पर रविवार को पेटलावद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पथ संचलन निकाला गया। केसरिया ध्वज की अगुवाई, घोष दल की धुन और पूर्ण गणवेश में अनुशासित कदमताल करते स्वयंसेवकों का संचलन नगर में आकर्षण का केंद्र रहा। नगर की केशव, माधव और मधुकर बस्ती से अलग-अलग निकले पथ संचलनों का पुराना नाका पर संगम हुआ। इसके बाद तीनों बस्तियों के स्वयंसेवक एक साथ कदमताल करते हुए गांधी चौक पहुंचे, जहां बौद्धिक कार्यक्रम के साथ आयोजन का समापन हुआ।
पुराने नाके पर तीनों संचलनों का संगम रहा खास
पथ संचलन के दौरान केशव बस्ती, माधव बस्ती और मधुकर बस्ती के स्वयंसेवक अपने-अपने निर्धारित मार्गों से आगे बढ़े। पुराने नाके पर तीनों संचलनों के एक साथ मिलने का दृश्य विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। यहां तीनों बस्तियों के स्वयंसेवक एकजुट होकर आगे बढ़े और गांधी चौक पहुंचे। यहां आयोजित बौद्धिक कार्यक्रम के साथ पथ संचलन संपन्न हुआ। तीन अलग-अलग स्थानों से शुरू हुए संचलनों का एक स्थान पर मिलना आयोजन की खास झलक रहा।
तीन बस्तियों से निकला पथ संचलन
व्यवस्था की दृष्टि से पेटलावद नगर को तीन बस्तियों—केशव, माधव और मधुकर—में विभाजित किया गया है। इसी व्यवस्था के तहत तीनों बस्तियों से अलग-अलग पथ संचलन निकाले गए। स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में अनुशासन और एकरूपता के साथ निर्धारित मार्गों से गुजरे। केसरिया ध्वज और संघ का घोष दल संचलन के प्रमुख आकर्षण रहे। गौरतलब है कि पहले नगर में एक ही पथ संचलन निकाला जाता था, लेकिन पिछले पांच वर्षों से बस्ती आधारित व्यवस्था के तहत अलग-अलग स्थानों से संचलन निकालने की परंपरा अपनाई जा रही है। इसी क्रम में नगर की तीनों बस्तियों से संचलन निकाले गए।
जगह-जगह पुष्पवर्षा कर किया स्वागत
पथ संचलन के मार्ग में विभिन्न स्थानों और चौराहों पर नागरिकों ने पुष्पवर्षा कर स्वयंसेवकों का स्वागत किया। नगर के प्रमुख स्थानों पर स्वागत की व्यवस्था की गई थी। घोष दल की धुन पर कदमताल करते स्वयंसेवकों को देखने के लिए मार्गों पर नागरिक भी मौजूद रहे। पूरे संचलन के दौरान अनुशासन और एकरूपता दिखाई दी।
विजयादशमी से जुड़ी है पथ संचलन की परंपरा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन हुई थी। इसी कारण विजयादशमी को संघ के स्थापना दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इस अवसर पर पथ संचलन आयोजित करने की परंपरा रही है। पेटलावद में इस वर्ष तीन बस्तियों से निकले संचलनों और पुराना नाका पर हुए उनके संगम ने आयोजन को विशेष पहचान दी। इसके बाद सभी स्वयंसेवक एक साथ गांधी चौक पहुंचे, जहां बौद्धिक कार्यक्रम संपन्न हुआ।
