नयी दिल्ली, 23 अक्टूबर (वार्ता) भारतीय नौसेना आगामी तीन से पांच नवंबर तक यहां हिन्द-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद का आयोजन करेगी जिसमें 18 देशों के विशेषज्ञ समुद्री विज्ञान, जलवायु और नयी प्रौद्योगिकी पर चर्चा करेंगे।
तीन दिन के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में विशेषज्ञ शैक्षणिक सहयोग, समुद्री सुरक्षा और महासागर प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा करेंगे।
इस वर्ष सम्मेलन का विषय ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विज्ञान, तकनीक और शैक्षणिक सहयोग’ रखा गया है। नौसेना मुख्य आयोजक नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के साथ मिलकर इस सम्मेलन का आयोजन कर रही है। सम्मेलन में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह स्मृति संबोधन देंगे। इसके अलावा विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह भी विशेष संबोधन करेंगे।
सम्मेलन का उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग के व्यापक ढांचे को ठोस और अमल में लाये जा सकने वाले प्रस्तावों में बदलना है। यह भारत की हिंद-प्रशांत महासागर पहल से जुड़ा है, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2019 में बैंकॉक में 14वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन के दौरान की थी। यह पहल भारत की ‘महासागर’ यानी विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास को साझा प्रयासों से आगे बढ़ाने की समुद्री सोच का अहम हिस्सा है।
सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, समुद्री व्यापार, आपूर्ति शृंखला से जुड़ी चुनौतियों, समुद्री संसाधनों पर बढ़ते दबाव और महत्वपूर्ण समुद्री ढांचे की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विचार होगा। इसमें विज्ञान के दायरे को केवल भौतिक विज्ञान और तकनीक तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि जीवन विज्ञान और सामाजिक विज्ञान को भी शामिल किया जायेगा। चर्चा में साझा शोध, तकनीक के संयुक्त विकास, वैज्ञानिक आंकड़ों तक उचित पहुंच और संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने के उपायों पर जोर रहेगा।
तीन दिनों में पांच प्रमुख विषयों पर सत्र आयोजित होंगे। इनमें शैक्षणिक नेटवर्क, शोध और मानव संसाधन विकास, समुद्री गतिविधियों की जानकारी और महत्वपूर्ण समुद्री ढांचे की सुरक्षा, समुद्र विज्ञान और जलवायु से निपटने की क्षमता, महासागर प्रबंधन में साझा प्रयास तथा नयी समुद्री तकनीकों और उनके दोहरे उपयोग से जुड़े पहलू शामिल हैं।
सम्मेलन में दो विशेष सत्र भी होंगे। ‘पर्सपेक्टिव्स फ्रॉम द फ्लैग ब्रिज’ सत्र में भारत और श्रीलंका के पूर्व नौसेना प्रमुख हिस्सा लेंगे। इसमें हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी के जरिए विज्ञान, तकनीक और शैक्षणिक सहयोग बढ़ाने के तरीकों पर विचार किया जायेगा। दूसरा विशेष सत्र ‘सहयोग का संवाद’ नाम से होगा, जिसमें राजदूत भाग लेंगे।
सम्मेलन में समुद्री क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं के विचार शामिल होंगे। इसका जोर ऐसे ठोस उपाय तलाशने पर होगा, जिन्हें राष्ट्रीय, उपक्षेत्रीय और पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के स्तर पर लागू किया जा सके। इन उपायों को आगे बढ़ाने के लिए द्विपक्षीय, त्रिपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग के मौजूदा माध्यमों का इस्तेमाल किया जायेगा।
