मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने जंतर-मंतर को दोबारा प्रदर्शन स्थल घोषित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा। पीठ ने पूछा कि क्या यह फैसला अदालत की मौखिक टिप्पणियों के कारण लिया गया या स्थल की उपयोगिता पर स्वतंत्र रूप से विचार किया गया था।
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह फैसला उच्चतम न्यायालय के आदेश के आधार पर नहीं लिया गया। उन्होंने बताया कि पहले गठित एक समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक स्थलों की सिफारिश की थी। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने 13 अक्टूबर को दिल्ली उच्च न्यायालय में कहा था कि यह फैसला उच्चतम न्यायालय के नौ अक्टूबर के आदेश के आधार पर लिया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने दलील दी कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को महज औपचारिकता नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थल सरकार के केंद्र के पर्याप्त नजदीक होना चाहिए, ताकि लोगों की शिकायतें प्रभावी ढंग से सुनी जा सकें।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत पहले सरकार से जवाब मांगेगी और उसके बाद मामले पर विचार करेगी। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भी जंतर-मंतर को फिर से प्रदर्शन स्थल घोषित करने का अनुरोध किया।
विवाद 11 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार द्वारा जारी स्थायी आदेश के बाद शुरू हुआ था। इसमें जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाकर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को वैकल्पिक स्थल घोषित किया गया था।
अधिवक्ता स्वाति सिंह की याचिका में कहा गया है कि जंतर-मंतर से प्रदर्शन हटाने के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के अधिकार प्रभावित होते हैं, क्योंकि प्रदर्शनकारियों को उन संस्थानों और लोगों से दूर कर दिया जाता है, जिन तक वे अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं।
