गुना:जिले के फतेहगढ़ स्वास्थ्य केंद्र के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। एक तरफ जहां अस्पताल में समय पर डॉक्टर नहीं मिलते और अन्य चिकित्सीय सुविधाएं नदारद हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीब और जरूरतमंद मरीजों को इलाज देने के बजाय कथित जिम्मेदार लोग मोटी फीस वसूलकर अपने निजी मेडिकल स्टोर और क्लीनिक चलाने पर अधिक जोर दे रहे हैं।
फतेहगढ़ जैसे बड़े कस्बे और लगभग 100 से अधिक गांवों की आबादी वाले इस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर पिछले दो सालों से कोई स्थायी एम्बुलेंस तक उपलब्ध नहीं है। सूत्रों के अनुसार, बमोरी बीएमओ डॉ. हेमंत धाकड़ भी फतेहगढ़ में पदस्थ हैं, जिसके बाद से यहां अस्पताल के हालात और अधिक गंभीर हो गए हैं। क्षेत्र के नागरिकों और पीड़ितों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि फतेहगढ़ स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्थाओं में तुरंत सुधार किया जाए, गायब रहने वाले डॉक्टरों और निजी प्रैक्टिस करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाए तथा अस्पताल में स्थायी एम्बुलेंस और पर्याप्त स्टाफ की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, ताकि आम जनता को राहत मिल सके।
मरीजों और ग्रामीणों की जुबानी – दर्द और बेबसी की दास्तान
अस्पताल की इस लचर व्यवस्था को लेकर स्थानीय ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। ग्रामीण सुनील भील ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया, “जब भी सरकारी अस्पताल में जाओ, वहां कोई डॉक्टर नहीं मिलता। सभी डॉक्टर अपने निजी कमरों पर मरीजों का इलाज करते हैं। अगर रात में कोई गंभीर समस्या हो जाए, तो अस्पताल से एंबुलेंस भी नहीं मिलती। मजदूरी से किसी तरह परिवार का गुजारा चल पाता है, ऐसे में हम डॉक्टर की मोटी फीस नहीं चुका सकते। यही कारण है कि मजबूरन हमें झोलाछाप डॉक्टरों के पास इलाज के लिए जाना पड़ता है।” एक अन्य ग्रामीण अमर सिंह ने बताया, “कभी भी अस्पताल जाओ, तो डॉक्टर साहब मरीजों को अपने निजी क्लीनिक पर ही बुलाते हैं और अपनी निजी मेडिकल दुकान से दवाइयों का एक लंबा और महंगा पर्चा थमा देते हैं। अब मजदूरी करने वाला इंसान इतनी महंगी दवाइयां कैसे खरीद सकता है?”
स्वास्थ्य सेवाओं पर उठ रहे गंभीर सवाल
ओपीडी से डॉक्टरों के गायब रहने और मरीजों को निजी क्लीनिकों पर बुलाए जाने की शिकायतें आम हो चुकी हैं। अस्पताल की प्रयोगशाला (लैब) में ताला लटका रहता है, जिससे मरीजों को खून और अन्य जरूरी जांचों के लिए निजी सेंटरों का रुख करना पड़ता है। 100 से अधिक गांवों के केंद्र बिंदु इस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर दो साल से एम्बुलेंस न होने से आपातकालीन स्थिति में मरीजों की जान पर बन आती है। महंगे पर्चे और निजी मेडिकल स्टोर्स से दवाइयां खरीदने की अनिवार्यता ने गरीब मजदूरों की कमर तोड़ दी है।
