यूपीआई पर शुल्क टालना स्वागत योग्य कदम

भारत में डिजिटल भुगतान व्यवस्था ने जिस तेजी से विस्तार किया है, वह देश की आर्थिक प्रगति और तकनीकी क्षमता का प्रमाण है. आज छोटी-बड़ी दुकानों से लेकर ठेले और रेहड़ी तक यूपीआई के माध्यम से भुगतान स्वीकार किया जा रहा है. इस व्यवस्था ने नकदी पर निर्भरता कम करने के साथ कारोबार को आसान बनाया है. ऐसे में यूपीआई के चुनिंदा मर्चेंट भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने के प्रस्ताव को दिवाली तक टालने का फैसला स्वागत योग्य है. त्योहारी सीजन में लिया गया यह निर्णय व्यापारियों और उपभोक्ताओं, दोनों को राहत प्रदान करने वाला है. नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने 13 अक्टूबर को हुई बैठक में एमडीआर संबंधी नए प्रावधानों को दिवाली के बाद तक टालने का निर्णय लिया है. पहले इन्हें 15 अक्टूबर से लागू किया जाना था. प्रस्तावित व्यवस्था के अंतर्गत दो हजार रुपये से अधिक के चुनिंदा यूपीआई मर्चेंट भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाए जाने की बात कही गई थी. इस हिसाब से दस हजार रुपये के भुगतान पर दुकानदार को 40 रुपये शुल्क देना पड़ सकता था. हालांकि, सामान्य यूपीआई लेनदेन और दो हजार रुपये से कम के भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहने की बात कही गई है.

भारत में दिवाली केवल धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर है. इस दौरान बाजारों में खरीदारी बढ़ती है, व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों में अतिरिक्त सामान जुटाते हैं और उपभोक्ता घरेलू जरूरतों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े, आभूषण तथा वाहनों तक की खरीदारी करते हैं. ऐसे समय में डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त लागत की आशंका कारोबारियों के लिए चिंता का विषय बन सकती है. खासकर छोटे दुकानदारों के लिए, जिनका मुनाफा सीमित होता है, प्रत्येक अतिरिक्त खर्च मायने रखता है. इसलिए शुल्क लगाने के फैसले को टालने से उन्हें त्योहार के दौरान अपना कारोबार सामान्य रूप से चलाने का अवसर मिलेगा. बहरहाल,विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसे प्रमुख आर्थिक संस्थानों ने भारत की आर्थिक विकास दर मजबूत बने रहने का अनुमान व्यक्त किया है. भारत की वृद्धि दर लगभग सात प्रतिशत रहने की संभावना के बीच घरेलू मांग, निजी खपत और बाजार में आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है. मजबूत आर्थिक विकास के लिए केवल बड़े निवेश और औद्योगिक उत्पादन ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि छोटे व्यापारियों का कारोबार और आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति भी अहम भूमिका निभाते हैं. त्योहारी खरीदारी को अतिरिक्त लागत से बचाने वाला यह निर्णय इसी दृष्टि से सकारात्मक है. हालांकि, शुल्क लगाने के प्रस्ताव को टालना स्थायी समाधान नहीं है. डिजिटल भुगतान से जुड़े बैंकों, भुगतान सेवा प्रदाताओं और फिनटेक कंपनियों के परिचालन खर्च तथा उनकी आय के स्रोतों पर भी विचार करना होगा. इसके लिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिससे भुगतान प्रणाली टिकाऊ बनी रहे और उसका बोझ छोटे व्यापारियों तथा ग्राहकों पर अनावश्यक रूप से न पड़े. डिजिटल अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल लेनदेन को ऑनलाइन करना नहीं, बल्कि कारोबार को सुगम बनाना और आर्थिक गतिविधियों को गति देना भी है. इसलिए यूपीआई शुल्क पर अंतिम निर्णय लेते समय सरकार और संबंधित संस्थाओं को सभी पक्षों के हितों में संतुलन स्थापित करना चाहिए.

बहरहाल,इस फैसले को टालना एक व्यावहारिक और स्वागत योग्य कदम माना जाना चाहिए.

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