
ग्वालियर। शहर में जिस जमीन पर आपका घर, फ्लैट या प्लॉट है, उसकी असलियत क्या है? कहीं वह सरकारी या कृषि भूमि पर तो विकसित नहीं किया गया? ग्वालियर में करीब 3000 करोड़ रुपये मूल्य की बताई जा रही 54 हेक्टेयर भूमि पर कथित अतिक्रमण का मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ पहुंचने के बाद ये सवाल फिर चर्चा में हैं। जनहित याचिका में कई आवासीय कॉलोनियों और टाउनशिप से जुड़ी जमीनों पर कब्जे के आरोप लगाए गए हैं। मामला केवल जमीन के कथित अतिक्रमण तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन के स्वामित्व, रजिस्ट्रियों और संबंधित विभागों की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, ये सभी आरोप हैं। जमीन के मालिकाना हक और कथित अतिक्रमण पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आना बाकी है।
याचिका में कई नामचीन परियोजनाओं के नाम
नवभारत प्रतिनिधि को प्राप्त जानकारी के अनुसार चंद्रशेखर साहू बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में दायर जनहित याचिका में सिटी सेंटर तहसील, सिरोल, डोंगरपुर, पुतलीघर, अलापुर, रमौआ और नैनगिर सहित विभिन्न क्षेत्रों की जमीनों का उल्लेख किया गया है। याचिका में अनेक आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं से जुड़ी भूमि पर कथित अतिक्रमण के आरोप लगाए गए हैं। याचिका का आरोप है कि सरकारी और कृषि भूमि पर आवासीय तथा व्यावसायिक परियोजनाएं विकसित की गईं। ऐसे में जमीन खरीदने वाले लोगों के लिए भी स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों की अहमियत बढ़ जाती है। हालांकि, याचिका में किसी परियोजना का नाम होना अपने आप में उसके अवैध होने का प्रमाण नहीं है। उनके सभी खरीदारों या संपत्तियों को विवादित मानना भी उचित नहीं होगा। वास्तविक स्थिति संबंधित भूखंड के रिकॉर्ड और सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होगी।
*अब आगे क्या?*
हाईकोर्ट के आदेश में फिलहाल नए पक्षकार बनाए गए प्रतिवादियों को नोटिस भेजने और उनकी तामील के बाद मामला सूचीबद्ध करने का निर्देश है। इस आदेश को सरकारी जमीन पर कब्जे के आरोपों की पुष्टि या किसी कॉलोनी को अवैध घोषित करने वाला अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। वहीं 25 अक्टूबर को अगली सुनवाई में संबंधित पक्षों का रुख और अदालत के आगे के निर्देश महत्वपूर्ण होंगे।
