केंद्र सरकार की कर व्यवस्था में सुधार की कोशिशों का उद्देश्य केवल राजस्व बढ़ाना नहीं, बल्कि करदाताओं का भरोसा कायम करना और कारोबार की राह आसान बनाना भी होना चाहिए. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में आयोजित जीएसटी काउंसिल की 57 वीं बैठक में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं. गिरफ्तारी और अभियोजन के प्रावधानों में राहत, जुर्माने में कमी, रिफंड की प्रक्रिया तेज करने और छोटे कारोबारियों के लिए अनुपालन का बोझ घटाने जैसे फैसले कारोबार जगत के लिए सकारात्मक संकेत हैं. हालांकि, इन सुधारों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब इन्हें पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ जमीन पर उतारा जाएगा.जीएसटी लागू होने के बाद देश में अप्रत्यक्ष करों की व्यवस्था एकीकृत हुई है. इससे राज्यों के बीच कारोबार की प्रक्रिया सरल हुई और कर प्रणाली को डिजिटल बनाने में मदद मिली. इसके बावजूद जटिल प्रक्रियाओं, नोटिसों, रिफंड में देरी और अधिकारियों के विवेकाधीन अधिकारों को लेकर व्यापारियों की शिकायतें बनी रही हैं. खासकर छोटे कारोबारियों के लिए कर संबंधी औपचारिकताएं समय और संसाधनों की बड़ी चुनौती हैं. ऐसे में काउंसिल के ताजा फैसले प्रक्रियागत जटिलताओं को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
अभियोजन शुरू करने की सीमा एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये करने और न्यूनतम सजा का प्रावधान हटाने जैसे प्रस्तावों से छोटे और मध्यम कारोबारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है. सामान्य जुर्माने को 25 हजार रुपये से घटाकर 10 हजार रुपये करने का फैसला भी इसी दिशा में है. कर संबंधी अनियमितताओं और जानबूझकर की गई कर चोरी के बीच स्पष्ट अंतर होना जरूरी है. प्रक्रियागत चूक को आपराधिक अपराध की तरह देखने के बजाय उसके अनुपात में कार्रवाई की जानी चाहिए. इससे ईमानदार करदाताओं में अनावश्यक भय कम होगा.
हालांकि, राहत का अर्थ कर चोरी के प्रति नरमी नहीं होना चाहिए. बहरहाल,पांच करोड़ रुपये तक के कारोबार वाले उपभोक्ता-केंद्रित छोटे व्यवसायों के लिए वैकल्पिक वार्षिक रिटर्न व्यवस्था की सिफारिश भी स्वागतयोग्य है. ई-कॉमर्स से जुड़े छोटे विक्रेताओं के लिए व्यावसायिक पते संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाने से डिजिटल बाजार में उनकी भागीदारी बढ़ सकती है. वहीं, माल की भौतिक जांच के लिए ठोस सूचना और वरिष्ठ अधिकारी की पूर्व स्वीकृति की व्यवस्था अनावश्यक हस्तक्षेप रोकने में मददगार हो सकती है.जीएसटी दरों में इस बार कोई बदलाव नहीं किया गया है. यह अपने आप में राहत या निराशा का विषय नहीं, क्योंकि कर सुधारों का मूल्यांकन केवल दरों से नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की सरलता से होना चाहिए. अब चुनौती इन निर्णयों के प्रभावी क्रियान्वयन की है. नियमों की स्पष्ट व्याख्या, अधिकारियों की जवाबदेही और शिकायतों के त्वरित निपटारे की व्यवस्था मजबूत करनी होगी. दरअसल,करदाता को हर कदम पर संदेह की नजर से देखने के बजाय उसे व्यवस्था का भागीदार मानना समय की मांग है. सरकार और करदाता के बीच भरोसा मजबूत होगा, तभी कारोबार आसान होगा, निवेश बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था को टिकाऊ गति मिलेगी.
