- जगजीत सिंह ने गजल को आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया।
- जगजीत सिंह साल 1965 में पिता को बिना बताए मुंबई आ गए थे।
- कुमार सानू को शुरुआती मौका देने का श्रेय भी जगजीत सिंह को दिया जाता है।
Jagjit Singh Death Anniversary Special Story: गजल सम्राट जगजीत सिंह की आवाज आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसती है। उनकी गाई गजलें और गीत लोगों को भावुक कर देते हैं। फिल्म ‘दुश्मन’ का गाना ‘चिट्ठी ना कोई संदेश’ हो या उनकी दिल को छू लेने वाली गजलें, जगजीत सिंह ने अपनी गायिकी से संगीत की दुनिया में अलग पहचान बनाई। 10 अक्टूबर 2011 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।
जगजीत सिंह को गजल को लोकप्रिय बनाने वाले कलाकारों में खास स्थान हासिल है। उनके योगदान की सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने शेरो-शायरी को केवल उर्दू जानने वाले लोगों तक सीमित नहीं रहने दिया। उनकी आसान प्रस्तुति और दिलकश आवाज ने गालिब, मीर और फिराक जैसे शायरों की रचनाओं को भी आम श्रोताओं के करीब पहुंचाया। उनकी गजलों में इस्तेमाल होने वाले शब्द और उन्हें गाने का अंदाज ऐसा था कि कम उर्दू जानने वाले लोग भी उनके भावों को समझ पाते थे। यही वजह है कि जगजीत सिंह की गजलें अलग-अलग पीढ़ियों के बीच लोकप्रिय रहीं।
पिता से छिपकर मुंबई पहुंचे थे जगजीत सिंह
जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुआ था। उनके पिता सरदार अमर सिंह धमानी चाहते थे कि बेटा इंजीनियर बने, लेकिन जगजीत का मन संगीत में लगता था। बचपन में ही उन्होंने गायिकी की ओर कदम बढ़ा दिए थे। साल 1961 में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के जालंधर स्टेशन से गाना शुरू किया। इसके बाद पंडित छगन लाल शर्मा और उस्ताद जमाल खान से संगीत की शिक्षा ली। कहा जाता है कि 1965 में वह पिता को बिना बताए मुंबई आ गए, जहां उन्होंने अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष किया।
विज्ञापनों से शुरू हुआ सफर
मुंबई में जगजीत सिंह ने विज्ञापनों के लिए जिंगल गाने से शुरुआत की। धीरे-धीरे उन्हें फिल्मों में भी गाने के अवसर मिले। बहुरुपी, भावना, खलनायक और दुश्मन जैसी फिल्मों के गीतों में उनकी आवाज सुनाई दी। चिट्ठी ना कोई संदेश आज भी उनके सबसे यादगार गीतों में गिना जाता है। जगजीत सिंह ने अपने संगीत सफर में दूसरे कलाकारों को भी आगे बढ़ने का अवसर दिया। कुमार सानू को शुरुआती मौका देने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
