
डॉ संजय पयासी
सतना: एग्रीयंगमैन की स्थापित छवि के युग में युवा आम चेहरे ने अपने अभिनय के दम पर रुपहले पर्दे की दुनिया मे ऐसी धाक जमाई की बड़े-बड़े कलाकारों ने उसके काम की मुक्तकंठ से प्रशंसा की.कहा जाता है कि कलाकार बनाए नहीं जाते जन्म से ही पैदा होते हैं. विश्वनाथ नाना पाटेकर के साथ कुछ ऐसा ही था.पिछली सदी के अंतिम दो दशक और वर्तमान सदी के अब तक कला और व्यवसायिक सिनेमा में जो स्थान नाना ने अपनी अभिनय क्षमता से हासिल किया वह न किसी को मिल पाया न ही कभी मिल पाएगा.मुम्बई के जे जे स्कूल ऑफ आटर्स में पेंटिंग के विद्यार्थी विश्वनाथ ने खुद भी कभी यह नही सोचा था कि वह अभिनय की इन उचाईयो को छुएगा.
नाना ने मराठी फिल्म नट सम्राट में अपने अंदर के अभिनेता को जिस ढंग से पेश किया उसने दर्शको को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि उनकी रंगमंच को लेकर जो सोच है वह किसी खाटी कलाकार की ही हो सकती है. फिल्मों के पोस्टर पेंट करते-करते अपने परखी मित्र एन चन्द्रा की पहली फिल्म अंकुश से हिंदी दर्शकों के बीच आने वाले नाना ने अपनी पहली फिल्म से अपना दर्शक वर्ग तैयार कर लिया था.
इसके बाद दर्जनों सफल व्यावसायिक फिल्मो में अभिनय करने वाले नाना पर कभी किसी स्टारडम का कोई प्रभाव नही पड़ा. बड़े से बड़े कलाकार के सामने नाना अपने हुनर से न सिर्फ दर्शको की धड़कन बढ़ा देते थे,बल्कि कुछ ऐसा भी कर जाते थे जिसकी वर्षो चर्चा बनी रहती थी.खामोशी द म्युजिकल में गूँगे-बहरे अभिभावक की भूमिका ऐसी थी जहां उन्हें कुछ बोलना नही था.फिर भी मनीषा कोइराला और अमीर खान के होते हुए भी उन्होंने अपनी पहचान कायम रखी.अपनी कला से सिस्टम के विरोधी युवाओ को पूरी उम्र साधने वाले नाना पाटेकर पचहत्तर की उम्र में भी संकल्प जैसी वेब सीरीज कर प्रेरणा के स्तोत्र बने रहेंगे.कहा जा रहा है कि अभी उनकी दो फिल्में शक्तिशाली और यथा आने को शेष हैं
