इंडिया गठबंधन के लोकतंत्र बचाओ मार्च में शामिल हुए 20 दलों के सांसद और कार्यकर्ता 

नई दिल्ली, विपक्षी इंडिया गठबंधन के तमाम सहयोगी दलों ने निष्पक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों को लेकर दिल्ली की सड़कों पर उतरकर अभूतपूर्व एकजुटता का प्रदर्शन किया है.

संसद भवन के मकर द्वार से निर्वाचन आयोग मुख्यालय की ओर बढ़े इस लोकतंत्र बचाओ मार्च में कांग्रेस, सपा, टीएमसी, एनसीपी शरद पवार, शिवसेना उद्धव ठाकरे, राजद ,झामूमो,बीजद और वामपंथी दलों सहित 20 विपक्षी दलों के लगभग 300 से अधिक लोकसभा व राज्यसभा सांसद और शीर्ष नेतृत्व ने हिस्सा लिया. इस संयुक्त आंदोलन का मुख्य उद्देश्य निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में की गई मतदाता सूचियों की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन एसआईआर प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं को उजागर करना और इसके विरोध में सीईसी ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग को पुरजोर तरीके से उठाना है.

प्रदर्शन के दौरान जमीन पर विपक्षी दलों का जबरदस्त आक्रोश देखने को मिला जब दिल्ली पुलिस ने निर्वाचन आयोग मुख्यालय की तरफ बढ़ रहे मार्च को नीति आयोग कार्यालय और आकाशवाणी भवन के पास भारी बैरिकेडिंग लगाकर बलपूर्वक रोक दिया. इससे आगे बढ़ने की अनुमति न मिलने पर सभी सहयोगी दलों के सांसद और वरिष्ठ नेता वहीं मुख्य सड़क पर धरने पर बैठ गए. नेताओं ने अपने हाथों में मुख्य चुनाव आयुक्त के विवादास्पद कटआउट और वोट चोर, गद्दी छोड़ तथा भाजपा ही मुख्य चुनाव आयुक्त है जैसी तख्तियां ले रखी थीं और वे लगातार सरकार व आयोग के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे. सांसदों व उनके समर्थकों को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों ने कड़ा रुख अपनाया और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव तथा टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी सहित कई सांसदों व युवा कार्यकर्ताओं को जबरन हिरासत में ले लिया.

राहुल-प्रियंका ने आंदोलन को जीवंत बनाया 

वैसे तो लोकतंत्र बचाओ मार्च सैद्धांतिक रूप से इंडिया गठबंधन के सभी सहयोगी दलों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत में आज भी इस पूरे आंदोलन के निर्विवाद नेता बनकर राहुल गांधी ही उभरे हैं. संसद भवन से निर्वाचन आयोग तक निकले इस विशाल मार्च में लगभग 20 दलों के शीर्ष नेता और लगभग 300 सांसद मौजूद थे, किंतु आंदोलन को आक्रामक अंदाज देने के लिए राहुल गांधी ने ही मोर्चा थामा. माहौल तब और भी गर्मा गया जब राहुल गांधी हाथ में तिरंगा लेकर खुद पुलिस बैरिकेड्स पर चढ़ गए और उनके साथ प्रियंका गांधी वाड्रा सहित अन्य नेता भी बैरिकेड्स के पास डटे रहे. इतना ही नहीं जब दिल्ली पुलिस ने भारी बलप्रयोग करते हुए प्रदर्शनकारी सांसदों को नीति आयोग के पास रोककर हिरासत में लेना शुरू किया और नेताओं को पुलिस बसों में भरा जाने लगा, तभी राहुल गांधी ने अप्रत्याशित रणनीति बनाई और पुलिस हिरासत की बस से तुरंत नीचे उतरकर चकमा देते हुए पास स्थित आकाशवाणी भवन के विशाल परिसर के भीतर प्रवेश करने में पूरी तरह सफल हो गए. उनके साथ प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल समेत कई कांग्रेसी सांसदों ने भी आकाशवाणी भवन परिसर में प्रवेश कर गई. उनके इस रणनीतिक कदम ने पुलिस प्रशासन के पूरे तंत्र को हतप्रभ कर दिया और जो आंदोलन कुछ ही मिनटों में हिरासत के साथ शांत हो सकता था, वह दिनभर के लिए एक अभूतपूर्व हाई-वोल्टेज राजनीतिक ड्रामे में तब्दील हो गया.

आकाशवाणी परिसर में बरगद के वृक्ष के नीचे बैठकर धरना जारी रखने और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग पर अडिग रहकर उन्होंने पूरे दिन इस विरोध प्रदर्शन को जनचर्चा के केंद्र में जीवंत बनाया.

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