
ग्वालियर। आज के आधुनिक और डिजिटल दौर में जहां हस्तकलाएं धीरे-धीरे ओझल होती जा रही हैं, वहीं शहर के छप्पर वाला पुल के पास बसे कुछ परिवार आज भी अपनी सदियों पुरानी पारंपरिक विरासत को पूरी निष्ठा के साथ संभाले हुए हैं। विजयादशमी (दशहरा) का पर्व नजदीक आते ही इस इलाके में चहल-पहल और कारीगरी का हुनर साफ नजर आने लगता है।
यहां के स्थानीय कारीगर अशोक और उमा देवी पिछले 40 सालों से रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बनाने का काम कर रहे हैं। यह उनका पुश्तैनी बिजनेस है, जिसे उनकी आने वाली पीढ़ी भी गर्व से आगे बढ़ा रही है।
2 फुट से लेकर 20 फुट तक के रावण
अशोक और मीना दोहरे ने बातचीत में बताया कि वे त्योहारों के मौसम में हर आकार के पुतले तैयार करते हैं। छोटी सोसायटियों और बच्चों के लिए 2 फुट के छोटे पुतलों से लेकर बड़े आयोजनों के लिए 15 से 20 फुट तक के विशालकाय रावण बनाए जाते हैं।
बांस की खपच्चियों को तराशने से लेकर, कागज चिपकाने और रावण के रोबीले चेहरों पर रंग भरने तक, परिवार का हर सदस्य इस काम में जुट जाता है।
दो से चार हजार तक में उपलब्ध, सैकड़ों पुतलों की बुकिंग
बाजार की मांग और लोगों के बजट को ध्यान में रखते हुए पुतलों की कीमत 200-300 से शुरू होकर 3,000 से 4,000 तक रखी गई है। इस सीजन में यह परिवार लगभग 200 से 300 पुतले बनाकर बेच देता है। एडवांस बुकिंग: दशहरे से कई दिन पहले ही शहर और आसपास के इलाकों से कई पुतलों की बुकिंग पूरी हो चुकी है।
परंपरा और आजीविका का संगम
छप्पर वाला पुल क्षेत्र के ये परिवार न केवल अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं, बल्कि ग्वालियर की सांस्कृतिक पहचान और लोक कला को भी जीवंत रखे हुए हैं। महंगाई और आधुनिक खिलौनों के दौर में भी हस्तनिर्मित पुतलों की यह मांग साबित करती है कि हमारी पारंपरिक कारीगरी का आकर्षण आज भी बरकरार है।
इनका कहना है…
हम पिछले 40 सालों से यही काम कर रहे हैं। यह हमारा पारिवारिक बिजनेस है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है। इस बार हम 2 फीट के छोटे पुतलों से लेकर 15 से 20 फीट तक के विशालकाय रावण तैयार कर रहे हैं। बाजार में मांग अच्छी है और लोग एडवांस बुकिंग करा रहे हैं।हर वर्ग के ग्राहक और बच्चों की पसंद को ध्यान में रखते हुए हमने पुतलों के दाम 200-300 से लेकर 5,000 से 10,000 तक रखे हैं।
अशोक कुमार (मुख्य कारीगर एवं दुकानदार)
हमारी कोशिश रहती है कि कम बजट वाले परिवार भी त्यौहार की खुशी मना सकें। हर सीजन में हमारे यहाँ से लगभग 200 से 300 पुतले बिक जाते हैं।आज के आधुनिक दौर में जब प्लास्टिक और रेडिमेड चीजों का चलन बढ़ गया है, तब भी हाथ से बने बांस और कागज के इन पुतलों का क्रेज कम नहीं हुआ है। कई हफ़्तों की मेहनत लगती है, लेकिन जब ग्राहक खुश होकर पुतला ले जाते हैं तो हमारी मेहनत सफल हो जाती है।”
मीना दोहरे(महिला कारीगर एवं सह-संचालक)
मलिक लोगों की परंपरा बच रही है और हम कारीगरों की रोजी-रोटी, हमें इसके अलावा और कोई काम नहीं आता इसलिए इसी काम में आनंद है ऐसा भी ठीक-ठाक मिल जाता है सरकार को सपोर्ट करें तो और अच्छा होगा।
मोनू कारीगर
