जबलपुर: हाईकोर्ट जस्टिस दीपक खोत की एकलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि बच्चे की कस्टडी के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार फैमिली कोर्ट को है। एकलपीठ ने जिला न्यायालय द्वारा पारित आदेश को निरस्त करते हुए प्रकरण को सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट भेजने के आदेश जारी किये है।याचिकाकर्ता मोहन राय की तरफ से दायर की गयी सिविल अपील में कहा गया था कि गार्जियन एण्ड वार्ड्स एक्ट की धारा 9 के तहत जिला न्यायालय में आवेदन दायर किया था। एक्ट की धारा 12 के तहत पेश किये गये अंतरिम आवेदन 5 अगस्त 2025 को प्रतिवादी पत्नी को नोटिस किये गये थे। प्रतिवादी के द्वारा जवाब पेश किया गया और 25 मार्च 2026 को दोनों पक्ष के तर्क सुनने के बाद न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।
संबंधित न्यायाधीश का स्थानांतरण होने के कारण प्रकरण को छठे जिला न्यायाधीश के समक्ष पेश करने तथा अंतरिम आवेदन पर नए सिरे से सुनवाई के आदेश जारी किये गये। अंतरिम आवेदन पर 12 मई 2026 की तिथि निर्धारित थी। इसके पूर्व 17 अप्रैल 2026 को अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की स्वीकार्यता का मुद्दा उठाया था। जबकि प्रतिवादी की ओर से ऐसी कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी।
इसके बाद आवेदक ने 30 अप्रैल 2026 को जबलपुर के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा जारी कार्य-वितरण आदेश प्राप्त किया था। जिसमें उल्लेख किया गया था कि गार्डियन एंड वार्ड्स एक्ट के प्रकरणों को छठे जिला न्यायाधीश को सौंपे गए थे। निचली अदालत ने 4 अगस्त 2026 को पारित आदेश में आवेदक को वापस करते हुए उचित फोरम के समक्ष पेश करने के निर्देश जारी किये।
याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि विवादित आदेश काम-बंटवारे के आदेश और सिविल कोर्ट नियम, 1958 के लागू प्रावधानों की अनदेखी करके पारित किया गया था। याचिका में राहत चाही गयी थी कि विवादित आदेश को रद्द करते हुए अंतरिम आवेदन पर निर्णय के लिए संबंधित अदालत में वापस जाये। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ अपील का निराकरण कर दिया।
