सतना : स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत शहर की पेयजल आपूर्ति को हाई-टेक और पारदर्शी बनाने का सपना पूरी तरह फेल साबित हो रहा है. शहर के सभी 45 वार्डों में जलापूर्ति की ऑनलाइन निगरानी के लिए लगभग 18 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार किया गया अत्याधुनिक स्कॉडा सिस्टम रस्सी के सहारे खड़ा है. जिस आधुनिक तकनीक के जरिए पाइपलाइन के लीकेज, पानी के प्रेशर और फ्लो रेट को कंट्रोल रूम में बैठकर डिजिटल तरीके से नियंत्रित करने के दावे किए गए थे वे जमीनी हकीकत में हवा-हवाई साबित हुए हैं.
शहर भर में लगाए गए महंगे सेंसर और फ्लो-मीटर अब डेटा भेजने में नाकाम हैं. जिसके चलते सिस्टम से मिलने वाली डिजिटल सुविधा पूरी तरह ठप हो चुकी है. इस पूरे प्रोजेक्ट का जिम्मा योकोगावा कंपनी को सौंपा गया था लेकिन करोड़ों रुपये के भुगतान के बावजूद जमीनी हालात जस के तस हैं. हालात यह हैं कि आधुनिक फिल्टर प्लांट में लगी मशीनें अब अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा लोहे के तार और रस्सियों के सहारे जुगाड़ से चलाई जा रही हैं.
कंट्रोल रूम में खराबी पकड़ने का कोई आधुनिक जरिया न बचने के कारण नगर निगम का अमला आज भी फॉल्ट खोजने के लिए नागरिकों की मैन्युअल शिकायतों पर ही निर्भर है.डिजिटल निगरानी फेल होने का सीधा खामियाजा शहर की जनता को भुगतना पड़ रहा है. 41 MLD फ़िल्टर प्लांट में बैकबास नहीं होने पर पानी ख़राब हो रहा है. जहां कई मोहल्लों में मटमैले और बदबूदार पानी की सप्लाई हो रही है वहीं कई इलाकों में लो-प्रेशर की वजह से लोगों को बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ रहा है. करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी शहर की पेयजल व्यवस्था पहले से भी बदतर स्थिति में पहुंच चुकी है.स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जल कर वसूलने के बाद भी पानी की सप्लाई में कोई सुधार नहीं हुआ हर महीने लगभग 158 रुपए जल कर लिया जाता है उसके बावजूद भी पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो रहा. जिससे पानी की समस्या आए दिन बनी रहती है.
इनका कहना
स्काडा सिस्टम कि कमियों को लेकर जानकारी मिली है.उसको जल्द से जल्द सुधार कार्य किया जाएगा.
राहुल पटेल
कार्यपालन यंत्री
