मुंबई, श्रीराम ग्रुप के चीफ इकोनॉमिस्ट अपूर्व जावडेकर के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अक्टूबर में होने वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक में महंगाई के अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए रेपो रेट में बढ़ोतरी कर सकता है। हालांकि, जावडेकर का मानना है कि ब्याज दरों में बढ़ोतरी न करने के पक्ष में भी मजबूत आर्थिक आधार मौजूद हैं। बढ़ती कोर महंगाई, कीमतों के दबाव में कुछ बढ़ोतरी, कम रियल ब्याज दरें और दुनियाभर में मौद्रिक नीति के सख्त होने से दर बढ़ाने का पक्ष मजबूत होता है। इसमें तेल की बढ़ती कीमतें अक्टूबर के फैसले के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक हो सकती हैं। हालांकि, लंबे समय तक दरों में बढ़ोतरी जारी रखने का आधार कमजोर है, क्योंकि आर्थिक विकास की रफ्तार कुछ धीमी हो रही है, बारिश की कमी का असर महंगाई की तुलना में ग्रामीण आय पर अधिक पड़ सकता है और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी मांग को भी प्रभावित कर सकती है।
अगस्त की MPC बैठक के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 80 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 102 डॉलर प्रति बैरल हो गई है। अगस्त में CPI महंगाई 4.82% रही, जबकि कोर महंगाई 4.16% से बढ़कर 4.44% हो गई। जावडेकर के अनुसार, महंगाई का दायरा कुछ बढ़ा है, लेकिन यह अभी भी RBI के अनुमानित स्तर के आसपास है। जुलाई-अगस्त की औसत CPI महंगाई 4.64% रही, जो RBI के 4.7% के Q2 अनुमान से थोड़ी कम है। वहीं, सुपरकोर महंगाई 2.95% रही। RBI के FY27 के लिए 95 डॉलर और 90 डॉलर प्रति बैरल के क्रूड अनुमान की तुलना में ब्रेंट की कीमत 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गई है। ऐसे में अक्टूबर की नीति बैठक में तेल की कीमतें एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती हैं।
दूसरी ओर, जावडेकर के अनुसार, आर्थिक विकास मजबूत बना हुआ है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में जोखिम दिखाई दे रहे हैं। Q1 FY27 में GDP वृद्धि 7.8% रही, जिसमें पूंजी निर्माण और निर्यात का प्रमुख योगदान रहा। क्रेडिट, GST, वाहन बिक्री, कैपिटल गुड्स और सीमेंट जैसे उच्च आवृत्ति वाले आर्थिक संकेतक भी मजबूत बने हुए हैं। हालांकि, खासकर MSME क्षेत्र में कैपिटल एक्सपेंडिचर ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील है। निर्यात पर अमेरिका की ओर से टैरिफ का जोखिम है और ग्रामीण मांग में भी कमजोरी के संकेत दिखाई दे रहे हैं। बारिश की कमी को महंगाई की तुलना में आर्थिक विकास के लिए बड़ा जोखिम माना जा रहा है, जिसका असर ग्रामीण आय पर पड़ सकता है।
जावडेकर के अनुसार, ऐसे में दरों में बढ़ोतरी का कोई भी चक्र सीमित रहने की संभावना है और भारतीय रुपये को सहारा देने के लिए नीतिगत ब्याज दरों का इस्तेमाल करने की बहुत कम गुंजाइश है। बाजार पहले ही अक्टूबर और दिसंबर में दरों में बढ़ोतरी की संभावना को कीमतों में शामिल कर चुका है। इसलिए बॉन्ड बाजार के शॉर्ट एंड में आगे और बड़ी बिकवाली का जोखिम नहीं दिखता। उनके अनुसार, दो साल की अवधि वाले बॉन्ड आकर्षक यील्ड दे सकते हैं और इनमें पूंजीगत जोखिम भी सीमित है। हालांकि, 10 साल के बॉन्ड अमेरिकी 10 साल के बॉन्ड में जारी बिकवाली, उर्वरक सब्सिडी बढ़ने से भारत की वित्तीय स्थिति पर पड़ने वाले दबाव और RBI की तरलता सोखने के लिए की जाने वाली OMO बिक्री के कारण दबाव में रह सकते हैं।
