बस लौटी, अब भरोसे की बारी

मध्य क्षेत्र की डायरी 

 

संदीप चंसौरिया 

 

2006 में थमी सरकारी बस सेवा करीब दो दशक बाद फिर शुरू हुई है. मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के तहत 351 बसों के साथ सरकार ने सार्वजनिक परिवहन में वापसी की है. 2031 तक 15 हजार बसें चलाने का लक्ष्य है. यह केवल बस सेवा की शुरुआत नहीं, सार्वजनिक परिवहन में सरकार की भूमिका की वापसी भी है. इस बार मॉडल पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप का है. बस निजी ऑपरेटर चलाएगा, लेकिन किराया, रूट, समय, सुरक्षा और सेवा की गुणवत्ता पर निगरानी सरकार की होगी. यानी स्टीयरिंग निजी हाथ में, जवाबदेही सरकार की. व्यवस्था तभी सफल होगी, जब निजी संचालन के बावजूद यात्रियों को पारदर्शिता और भरोसा मिले. जनता की अपेक्षाएं स्पष्ट हैं—बस समय पर आए, किराया तय हो, रूट स्पष्ट हो और शिकायतों पर तुरंत सुनवाई हो. इसके लिए हेल्पलाइन, ऑनलाइन शिकायत व्यवस्था और नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग जरूरी होगी.पहले चरण में भोपाल, इंदौर, जबलपुर, रीवा, देवास और कटनी समेत सात शहरों में 351 बसें उतारी गई हैं. इनमें अधिकांश इलेक्ट्रिक हैं और जीपीएस व सुरक्षा सुविधाओं से लैस हैं. लेकिन यात्री के लिए आधुनिक बस की पहली पहचान यही होगी कि बस समय पर आए. तकनीक तभी सार्थक है, जब उससे बसों की जानकारी आसानी से मिले और सेवा बेहतर हो.

असली चुनौती 351 से 15 हजार बसों तक पहुंचने की नहीं, पूरे नेटवर्क को अनुशासन से चलाने की है. निजी ऑपरेटरों की जवाबदेही, रखरखाव, तय किराया, पर्याप्त फेरे और शिकायतों का त्वरित निपटारा—इन पर सरकार को लगातार निगरानी रखनी होगी. सेवा का विस्तार छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक हो और वहां भी नियमित संचालन सुनिश्चित किया जाए.परियोजना की कमान वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीष सिंह के हाथों में है. नगरीय प्रशासन और इंदौर की व्यवस्थाओं में उनके लंबे अनुभव का लाभ अब इस व्यापक परियोजना को मिल सकता है. प्रदेशभर की अलग-अलग स्थानीय जरूरतों को समझते हुए संचालन को दिशा देने और व्यवस्था को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू कराने में उनकी विशेषज्ञता महत्वपूर्ण साबित हो सकती है.

उनके अनुभव से परियोजना को प्रशासनिक दिशा मिल सकती है, लेकिन इसकी सफलता अंततः रोजमर्रा के संचालन पर निर्भर करेगी. बसें समय पर चलें, रूट और फेरे तय मानकों के अनुसार हों, ऑपरेटरों की जवाबदेही तय हो और यात्रियों की शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो—यही वे कसौटियां हैं, जिन पर इस सेवा का भरोसा टिकेगा.करीब दो दशक बाद सरकारी बस सेवा लौटी है. मॉडल निजी है, लेकिन जिम्मेदारी सरकारी ही रहेगी. 351 बसों से शुरू हुआ यह सफर 15 हजार तक पहुंचे, यह लक्ष्य है; जनता के लिए असली मंजिल तब होगी, जब बस का इंतजार परेशानी नहीं, भरोसे का हिस्सा बने.

बसें सड़क पर आ गई हैं, अब सरकार को भरोसा भी सड़क पर उतारना है. यह भरोसा घोषणाओं से नहीं, समय पर आती बसों, तय किराए, सुरक्षित सफर और त्वरित कार्रवाई से बनेगा. तभी यह योजना परिवहन सेवा से आगे बढ़कर सार्वजनिक जिम्मेदारी का नया मानक बन सकेगी.

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संगठन को नया महामंत्री, अब समन्वय की परीक्षा

आठ महीने बाद मध्यप्रदेश भाजपा को पूर्णकालिक संगठन महामंत्री मिला है. चंद्रशेखर की नियुक्ति के साथ हितानंद शर्मा के बाद चली आ रही अंतरिम व्यवस्था खत्म हुई है. इस दौरान क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का काम संभाल रहे थे.संगठन महामंत्री भाजपा में सिर्फ संगठन चलाने वाला पद नहीं है. यह सत्ता और संगठन के बीच संवाद की वह कड़ी है, जहां सरकार की प्राथमिकताओं और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के बीच तालमेल बैठाना होता है. मध्यप्रदेश में यह जिम्मेदारी ऐसे समय मिली है, जब कार्यकर्ताओं और सरकार के बीच संवाद तथा नौकरशाही को लेकर असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं.दतिया उपचुनाव के बाद पूरे जिला संगठन को भंग किया जाना भी संगठन के भीतर आत्ममंथन और चुनावी स्तर पर उठे सवालों का संकेत रहा. पार्टी ने हालांकि गुटबाजी और अन्य आरोपों को आधिकारिक निष्कर्ष के रूप में स्वीकार नहीं किया है.ऐसे माहौल में चंद्रशेखर की भूमिका सिर्फ संगठन को सक्रिय करने तक सीमित नहीं होगी. उन्हें सत्ता और संगठन के बीच पैदा होने वाली दूरी को संवाद में बदलना होगा. कार्यकर्ता सरकार तक अपनी बात पहुंचा सकें और सरकार की उपलब्धियां संगठन के जरिए जमीन तक पहुंचें—यही समन्वय का मूल उद्देश्य होगा.चंद्रशेखर के पास राजस्थान और तेलंगाना में संगठनात्मक जिम्मेदारियों का अनुभव है. अब मध्यप्रदेश में उनके सामने चुनौती संगठन को गति देने के साथ सत्ता-संगठन के रिश्ते में संतुलन बनाने की है.आठ महीने की खाली कुर्सी भर गई है, अब देखना यह है कि यह नियुक्ति सिर्फ संगठन महामंत्री देती है या सत्ता-संगठन के बीच संवाद की नई धुरी भी बनाती है.

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