हटा/दमोह: बड़े बाबा की अतिशय नगरी कुण्डलपुर में आयोजित दशलक्षण संस्कार शिविर के समापन समारोह में साधना के साथ सेवा, त्याग, समर्पण और श्रम के सम्मान का संदेश प्रमुखता से सामने आया। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति का महत्व उसके पद, प्रतिष्ठा या आर्थिक योगदान से नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और सेवा से होता है। समाज और आयोजन के लिए निस्वार्थ भाव से श्रम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है।
मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि दानदाता हो अथवा न हो, आयोजन में छोटा से छोटा व्यक्ति भी यदि अपनी क्षमता के अनुसार मेहनत कर रहा है तो उसके श्रम का सम्मान होना चाहिए। अनेक कार्यकर्ता पर्दे के पीछे रहकर बिना किसी अपेक्षा के अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। दूसरों की सुविधा और आयोजन की सफलता में अपनी खुशी देखना ही सच्ची सेवा भावना है। उन्होंने कार्यकर्ताओं के त्याग की तुलना घराती से करते हुए कहा कि जिस प्रकार घराती बरातियों की व्यवस्था करते-करते कई बार स्वयं भोजन से वंचित रह जाता है, उसी प्रकार आयोजन के कार्यकर्ता भी दूसरों की सुविधा के लिए अपनी सुविधा पीछे कर देते हैं। सबकी व्यवस्था अच्छी हो जाए और आयोजन सफल हो जाए, यही उनके लिए सबसे बड़ा संतोष होता है।
संघस्थ मुनि श्री पवित्र सागर जी महाराज ने कहा कि परिस्थितियां हमेशा अनुकूल नहीं होतीं। साधक को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी चित्त को शांत और स्थिर रखते हुए पुरुषार्थ करना चाहिए। दशलक्षण महापर्व केवल दस दिनों की धार्मिक साधना नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने का अवसर है। इन दिनों ग्रहण किए गए संयम और सद्गुणों को पर्व के बाद भी जीवन में बनाए रखना ही साधना की सार्थकता है। उन्होंने खान-पान की शुद्धता और घर की रसोई के संस्कारों पर जोर देते हुए कहा कि भोजन का प्रभाव केवल शरीर पर नहीं, बल्कि परिवार के वातावरण और संस्कारों पर भी पड़ता है। इसलिए शुद्धता, संयम और अच्छे संस्कारों की शुरुआत घर से होनी चाहिए।
