प्रवेश कुमार मिश्र
नई दिल्ली। चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा व्यक्तिगत रूप से पाला बदल या दो तिहाई संख्याबल के सहारे दल बदल की बढ़ती घटनाओं ने राजनीतिक दलों को चौकन्ना कर दिया है.टीएमसी से सबक लेते हुए कांग्रेस,सपा और आम आदमी पार्टी द्वारा उत्तर प्रदेश व पंजाब विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को बेहद सख्त और पारदर्शी चयन कवच बना दिया गया है.
सूत्रों की मानें तो इस नई दीर्घकालिक रणनीति के तहत टिकट वितरण के दौरान वरिष्ठ नेताओं द्वारा अपने-अपने चहेतों और गुट के लोगों को उपकृत करने के लिए बनाए जाने वाले पारंपरिक दबाव को भी पूरी तरह से खत्म करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं. बताया जा रहा है कि कांग्रेस व सपा के रणनीतिकार अपने अपने विश्वस्त एजेंसियों के सहारे एकत्रित किए डेटा और स्वतंत्र सर्वे पर आधारित चयन प्रणाली को लागू कर आंतरिक गुटबाजी पर नकेल कसने की कोशिश कर रहे हैं .
त्तर प्रदेश में कांग्रेस व सपा ने इस बार साफ संदेश दिया है कि किसी भी बड़े नेता की सिफारिश पर तब तक विचार नहीं किया जाएगा, जब तक कि स्वतंत्र एजेंसियों के ग्राउंड असेसमेंट और खुफिया फीडबैक में उस उम्मीदवार की मजबूत जमीनी पकड़ प्रमाणित नहीं होती हो. इसी तरह पंजाब में आम आदमी पार्टी ने एक अलग और अधिक कॉर्पोरेट शैली की चयन प्रक्रिया अपनाई है. आप उम्मीदवारों की व्यक्तिगत ईमानदारी, उनके वित्तीय स्रोतों और स्थानीय जनता के बीच उनकी छवि का व्यापक स्तर पर स्वतंत्र एजेंसियों से सर्वे कराया जा रहा है. इसके साथ ही स्थानीय स्तर की ब्लैकमेलिंग और गुटीय वीटो को खत्म करने के लिए स्क्रीनिंग कमेटी के ऊपर एक स्वतंत्र पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी को अंतिम अधिकार सौंपे हैं, जो सिर्फ योग्यता और निष्ठा के आधार पर फैसला लेगी. ऐसे में अब केवल चुनाव जीतने की क्षमता ही टिकट का पैमाना नहीं है, बल्कि उम्मीदवार की वैचारिक दृढ़ता और संकट के समय पार्टी के साथ खड़े रहने के इतिहास को प्राथमिक योग्यता माना जा रहा है.
सूत्रों की मानें तो नए प्रयोग के तहत उम्मीदवारों को वैचारिक रूप से बांधने और उन पर नैतिक दबाव सुनिश्चित करने के लिए उक्त तीनों दलों की ओर से टिकट फाइनल होने से पहले उम्मीदवारों से एक आंतरिक शपथपत्र भरवाए जाने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी. इस गोपनीय निष्ठा पत्र में मुख्य रूप से सात वचन लिए जाएंगे. हालांकि इस आंतरिक शपथपत्र की कानूनी वैधता भारतीय संविधान और चुनाव आयोग के मौजूदा नियमों के तहत बेहद सीमित यानी सिर्फ प्रतीकात्मक है. इस संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता का तर्क है कि निष्ठा पत्र कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होने के बावजूद व्यवहारिक रूप से कारगर साबित होगा क्योंकि पांच साल बाद सभी को जनता की अदालत में जाना ही पड़ता है और यह उस समय राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. चूंकि इस मॉडल को कांग्रेस द्वारा भविष्य के सभी चुनावों के लिए एक मार्गदर्शक व्यवस्था माना जा रहा है, इसलिए वह उत्तर प्रदेश में इस प्रक्रिया को प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल कर रही है
