
ग्वालियर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को न्यायालय पहले ही निरस्त कर चुका है, तो पीड़ित या उसके परिजन सरकारी वित्तीय सहायता अथवा मुआवजे के हकदार नहीं रह जाते।
जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने मुन्ना बाबू शाक्य की 8.50 लाख रुपये के मुआवजे की याचिका खारिज करते हुए कहा कि जब मूल आपराधिक मामला ही समाप्त हो चुका है, तब मुआवजे का कानूनी आधार भी समाप्त हो जाता है।
यह मामला राकेश शाक्य की आत्महत्या से जुड़ा था, जिसमें पत्नी के कथित अवैध संबंधों और प्रताड़ना के आरोपों के आधार पर आईपीसी की धारा 306, 34 तथा एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने 4 जनवरी 2023 को एफआईआर, चार्जशीट और पूरी आपराधिक कार्यवाही यह कहते हुए रद्द कर दी थी कि जातिगत दुर्भावना अथवा एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध का प्रथमदृष्टया कोई आधार नहीं बनता।
अपने ताजा आदेश में कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी नियमों के तहत दी जाने वाली आर्थिक सहायता का उद्देश्य पीड़ितों का पुनर्वास है, लेकिन यह तभी संभव है जब अधिनियम के तहत अपराध का अस्तित्व या प्रथमदृष्टया आधार बना रहे। यदि न्यायालय अपराध संबंधी पूरी कार्यवाही को ही निरस्त कर दे, तो मुआवजे का दावा स्वतः समाप्त हो जाता है।
