पदोन्नति अटकने से कर्मचारियों का मनोबल टूटा, वरिष्ठों को लाभ से कनिष्ठ बैचेन

आशीष कुर्ल

भोपाल: मध्यप्रदेश के शासकीय कर्मचारियों की पदोन्नति का मुद्दा पिछले एक दशक से उपेक्षा और पक्षपात की भेंट चढ़ा हुआ है, जिससे राज्य की नौकरशाही हताश और निरुत्साहित है। प्रशासनिक सिद्धांतों के अनुसार वेतन वृद्धि में देरी हो सकती है, परंतु समय पर पदोन्नति कर्मचारी मनोबल बनाए रखने के लिए आवश्यक है।सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2016 से अब तक हज़ारों निम्नस्तरीय कर्मचारियों को पदोन्नति से वंचित रखा गया है, जबकि वरिष्ठ अधिकारियों को बिना किसी विलंब के लाभ मिलता रहा है।

मंत्रालय सेवा अधिकारी एवं कर्मचारी संघ का कहना है कि इस भेदभाव से अधीनस्थ कर्मचारियों की कार्यक्षमता और प्रतिबद्धता पर प्रतिकूल असर पड़ा है, जिससे सुशासन के उद्देश्य कमजोर हो रहे हैं।संघ नेताओं का आरोप है कि प्रशासनिक निर्णयों पर अदृश्य दबाव और पक्षपात हावी रहा है। उन्होंने बताया कि अन्य विभागों में चुपचाप लागू की गई व्यवस्था—जैसे उच्च पदनाम के साथ वेतनमान देना—यहाँ भी अपनाई जा सकती थी, लेकिन बार-बार प्रस्ताव देने के बावजूद इसे अनदेखा किया गया।

नेताओं ने सुझाव दिया कि आरक्षित और अनारक्षित वर्गों के कोटे के भीतर निष्पक्ष नियम लागू किए जाएं और कनिष्ठों को वरिष्ठों से आगे न बढ़ाया जाए। मगर लंबे समय से चली आ रही निष्क्रियता ने कर्मचारियों की निराशा बढ़ा दी है, जिसका सीधा असर शासन और प्रदेश की आठ करोड़ जनता पर पड़ रहा है।

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