बीजिंग। Rare Earths का नाम भले ही ‘Rare’ हो, लेकिन आधुनिक दुनिया की टेक्नोलॉजी और डिफेंस के लिए इनकी अहमियत बेहद ज्यादा है। इलेक्ट्रिक कारों से लेकर विंड टर्बाइन, चिप्स, डेटा सेंटर और रक्षा प्रणालियों तक—इनका इस्तेमाल कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में होता है। चीन की ताकत सिर्फ Rare Earth के भंडार में नहीं, बल्कि उनकी प्रोसेसिंग और Permanent Magnets बनाने की क्षमता में भी है।
यही वजह है कि ट्रंप-शी बातचीत में Rare Earths और उनकी सप्लाई चेन अहम मुद्दा बनती है। अमेरिका के लिए इनकी लगातार सप्लाई जरूरी है, जबकि चीन के पास इस पूरी सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण क्षमता है। ऐसे में सवाल यही है—क्या दोनों देशों के बीच समझौते से Rare Earths की सप्लाई आसान होगी, या ट्रेड वॉर में ये चीन का दबाव बनाने वाला हथियार बनी रहेंगी?
