नई दिल्ली। भारतीय मुद्रा और कच्चे तेल के बाजार में इस समय दबाव देखने को मिल रहा है। 21 सितंबर को डॉलर के मुकाबले रुपया करीब ₹95.87 पर बंद हुआ। बीते सप्ताह कारोबार के दौरान रुपये ने ₹96 प्रति डॉलर का स्तर भी देखा था। उधर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent crude करीब 102 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहा।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88.7 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। विदेशों से तेल खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। इसलिए क्रूड महंगा होने और रुपया कमजोर होने पर भारत का आयात खर्च बढ़ सकता है।
आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से अगस्त के बीच देश का क्रूड इंपोर्ट बिल लगभग 48 प्रतिशत बढ़कर 74.8 अरब डॉलर हो गया। सितंबर में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत भी पिछले साल के मुकाबले काफी ऊंची रही।
आम लोगों तक कैसे पहुंचेगा असर?
कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने पर परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। इसका असर एयरलाइंस और पेट्रोलियम पर निर्भर कई उद्योगों पर भी पड़ सकता है। आगे चलकर लागत बढ़ने का दबाव कुछ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर दिखाई दे सकता है।
हालांकि, 21 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कुछ नरमी भी दर्ज हुई। पश्चिम एशिया के तनाव को लेकर संभावित बातचीत की उम्मीद से बाजार को थोड़ी राहत मिली है।
अब बाजार की नजर दो चीजों पर है—मध्य-पूर्व में तनाव की दिशा और कच्चे तेल की कीमत। अगर तेल महंगा और रुपया कमजोर दोनों लंबे समय तक बने रहते हैं, तो भारत के आयात खर्च और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
