नयी दिल्ली, 18 सितंबर (वार्ता) इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के अध्यक्ष एन.के. सिंह ने शुक्रवार को कहा कि भारत को विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए निवेश को समर्थन देने वाली घरेलू बचत के स्तर को बढ़ा कर 40 प्रतिशत के दायरे में ले जाना होगा। श्री सिंह 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष रहे हैं।
उन्होंने यहां केंद्रीय वित्त मंत्रालय के तत्वावधान आयोजित राज्यों के वित्त मंत्रियों और वित्त सचिवों के दो दिन के दूसरे सम्मेलन के पहले दिन उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कर प्रशासन और श्रम, पूंजी तथा जमीन के बाजार में सुधारों को आगे बढ़ाने, राजकोषीय स्थिति को मजबूत करने में राज्यों की सक्रियता को बढ़ाने जैसे मुद्दों को भी रेखांकित किया।
श्री सिंह ने कहा , ” हमारी सकल घरेलू बचत दर-जिसमें परिवारों, निजी क्षेत्र और सरकार की बचत शामिल है-सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 34 प्रतिशत के स्तर पर है। हम जानते हैं कि विकसित भारत के लिए आवश्यक 7-8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने के लिए यह पर्याप्त नहीं है।….. इसलिए हमें 38-40 प्रतिशत की बचत दर का लक्ष्य रखना चाहिए, ताकि विकसित भारत के लिए आवश्यक निवेश को समर्थन मिल सके।” उन्होंने कहा कि जैसा कि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष ने भी उल्लेख किया है, इस दर में क्रमिक रूप से वृद्धि होनी चाहिए। भारत विगत में जीडीपी के 38 प्रतिशत के स्तर की बचत दर हासिल कर चुका है।
डॉ सिंह ने कहा कि यह सम्मेलन ऐसे मोड़ पर हो रहा है जब भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े सकारात्मक संकेत दिखाई दे रहे हैं। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसी सप्ताह जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत की रेटिंग बीबीबी से बढ़ाकर ए- कर दी है। भारत काफी समय से अपनी रेटिंग में इस उन्नयन की मांग कर रहा था।
लेकिन उन्होंने कहा , ” हम जानते हैं कि विकसित भारत ) के लिए आवश्यक 7-8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने के लिए यह पर्याप्त नहीं है।” इसी संदर्भ में उन्होंने बचत के स्तर को बढ़ाये जाने पर बल दिया ताकि निवेश और वृद्धि की गति बढ़ायी जा सके।
श्री सिंह ने देश में मानव पूंजी में सुधार और अनुसंधान एवं विकास पर अधिक ध्यान दिये जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। मानव संसाधन के उन्नयन के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए नाम लिखवाने वालों की संख्या बढ़ाने से बढ कर सीखने के परिणामों को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि बेहतर बुनियादी ढाँचा और व्यापारिक खुलेपन से घरेलू उत्पादन में प्रौद्योगिकी और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिल सकता है।
उन्होंने राजकोषीय मजबूती की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि केंद्र सरकार 2030-31 तक अपने ऊपर ऋण को जीडीपी के 50 प्रतिशत या उससे एक प्रतिशत कम बेशी के स्तर तक सीमित करने के लक्ष्य की दिशा में अच्छी प्रगति कर रही है। वर्तमान में सभी राज्यों को ऋण स्तर लगभग 28 प्रतिशत है।
सोलहवें वित्त आयोग का अनुमान है कि 2030-31 तक सामान्य सरकारी ऋण (केंद्र राज्य सब मिला कर) जीडीपी के 73.1 प्रतिशत तक आ जाएगा, जो वर्तमान के लगभग 84 प्रतिशत है। श्री सिंह ने कहा यह स्थिति अभी भी कुछ हद तक चुनौतीपूर्ण है तथा प्रतिकूल भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ और बाहरी कारक कर्ज को कम करने के लक्ष्य की राह में चुनौती बढ़ा सकते हैं।
श्री सिंह ने कहा कि भारत कर की दरों में बढ़ोतरी की बजाय सूचनाओं का इस्तेमाल करते हुए कर वसूली और कर अनुपात बढ़ा सकता है।
कर-जीडीपी अनुपात की बहस पर श्री सिंह ने कहा कि विशेषज्ञों के बीच इस बात पर मतभेद है कि मध्यम आय वाले देशों के संदर्भ में हमारा 19 प्रतिशत का कर-जीडीपी अनुपात बहुत अधिक है या नहीं। उन्होंने कहा कि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें काफी वृद्धि की जरूरत है।
इस संबंध में उन्होंने आईएमएफ के एक परचे का उदाहरण दिया और कहा पिछले वर्ष भारत पर इस संस्था के अनुच्छेद चार के परिचर्चा पत्र में कहा गया था कि भारत की कर क्षमता और वास्तविक कर राजस्व के बीच का जीडीपी के लगभग 4 प्रतिशत के बराबर अंतर है।
श्री सिंह ने कर:जीडीपी अनुपात को क्षमता तक पहुँचने के लिए कर नीति की संरचना में सुधार करने और कर प्रशासन की दक्षता को लगातार बेहतर बनने की जरूरत पर बल दिया।
उन्होंने कहा, ” मेरा अपना आकलन है कि बड़ा अवसर कर दरों से अधिक सूचना और डेटा में है। आज हमारे पास कर संबंधी डेटा की अभूतपूर्व मात्रा उपलब्ध है। एआई और मशीन लर्निंग इस डेटा को उपयोगी और कार्रवाई योग्य जानकारी में बदल सकते हैं। इनका उपयोग अनुपालन में मौजूद कमियों की पहचान करने, प्रवर्तन को लक्षित करने और प्रभावी कर आधार को व्यापक बनाने के लिए भी किया जा सकता है। यह बात केंद्र और राज्यों-दोनों पर लागू होती है।”
उन्होंने कहा कि इससे कर अनुपालन प्रणाली का आधुनिकीकरण किया जा सकता है और अधिक राजस्व जुटाने में मदद मिल सकती है।
श्री सिंह ने संसाधनों के बाजार में सुधार के मुद्दे पर कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत यह केंद्र और राज्यों, दोनों की साझा जिम्मेदारी है। पूंजी और वित्त संघ सूची में आते हैं, श्रम समवर्ती सूची में है, जबकि भूमि राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है।
उन्होंने कहा, ”आज की हमारी बैठक प्रधानमंत्री की व्यापक “सहकारी संघवाद” को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को और गहरा करने का संकेत देती है। अब हमें प्रतिस्पर्धी संघवाद की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए, जहाँ राज्य विकास के विभिन्न मानकों पर सार्थक रूप से एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें और एक-दूसरे के अनुभव साझा कर सकें।”
उन्होंने कहा कि सार्थक संवाद के लिए परामर्शात्मक तंत्र लंबे समय से अपेक्षित रहे हैं। योजना आयोग के दौर में भी विकास परिषदों की बैठकें बहुत अधिक संवादात्मक नहीं होती थीं। वे अधिक केंद्रीय सहायता और वित्तीय संसाधनों की कमी की मांग का मंच बनकर रह जाती थीं। नीति आयोग की संचालन परिषद ने महत्वपूर्ण चर्चाओं को बढ़ावा दिया है और नए विचारों को विकसित करने में मदद की है। हालांकि, बदलाव के दौर का प्रभाव अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
