बांस से अब टोकरी नहीं बिस्किट-नूडल्स बनेगा  

डिंडोरी। हर साल 18 सितंबर को मनाया जाने वाला विश्व बांस दिवस (वर्ल्ड बैम्बू डे) इस बार मध्य प्रदेश के लिए खास है। 2009 में बैंकॉक में शुरू हुए इस दिवस का मकसद तो बांस के महत्व को बताना था, लेकिन डिंडोरी जिले के बजाग जैसे जनजातीय अंचल में अब बांस सिर्फ “गरीबों की इमारत” या “हरा सोना” नहीं रहा, बल्कि किचन तक पहुंच गया है।

बांस और जनजातीय समाज का रिश्ता सदियों पुराना है। गोंड, बैगा, भारिया, उरांव और कंवर समुदाय के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक बांस साथ देता है। झापा से लेकर घर की दीवार, मछली पकड़ने की टोकनी, तीर- कमान और बांसुरी तक सब बांस से बनता है। बस्तर का बांस शिल्प तो दुनिया भर में मशहूर है। हरेली और करमा जैसे त्योहारों में भी बांस के बिना पूजा अधूरी है। लेकिन प्लास्टिक के दौर में बांस शिल्प पर संकट आया। इसी संकट को अवसर में बदला है मध्य प्रदेश के शोधकर्ता डॉ. विकास जैनने। शोध “बैम्बू शूट्स फॉर फोर्टिफिकेशन एंड नॉवल फूड प्रोडक्ट डेवलपमेंट” अब चर्चा में है।

क्या है डॉ. जैन का शोध?

डॉ. जैन ने मध्य प्रदेश के डिंडोरी, मंडला, बालाघाट और शहडोल के जंगलों में मिलने वाली खाने योग्य प्रजाति डेंड्रोकैलमस हैमिल्टोनाई की कोंपल (करिल) पर काम किया। आदिवासी जिसे सदियों से सब्जी के रूप में खाते आए हैं, उसी करिल को उन्होंने पाउडर और पेस्ट में बदलकर रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों में मिलाया।

उन्होंने बांस शूट फोर्टिफाइड बिस्किट, क्रिस्पी नमकीन और इंस्टेंट नूडल्स तैयार किए। कोंपल को तीन तरह से प्रोसेस किया – कच्चा पेस्ट, 20 मिनट उबाल कर और 24 घंटे पानी में भिगो कर, ताकि उसकी प्राकृतिक कड़वाहट और सायनाइड तत्व निकल जाए और वह पूरी तरह सुरक्षित हो जाए।

चौंकाने वाले नतीजे

2025 में प्रकाशित उनके पेपर “न्यूट्रिशनल एंड फाइटोकेमिकल एनालिसिस ऑफ बैम्बू शूट्स एज अ फूड एंड मेडिसिनल वैल्यू” के अनुसार, बांस की कोंपल में 34 प्रतिशत प्रोटीन, 34 प्रतिशत फाइबर, विटामिन- सी और 8 प्रकार के जरूरी अमीनो एसिड होते हैं, जबकि फैट न के बराबर होता है। 10 प्रतिशत बांस पाउडर और 20 प्रतिशत पेस्ट मिलाने पर भी बिस्किट का स्वाद बना रहा, लेकिन पौष्टिकता कई गुना बढ़ गई।

डॉ. जैन का मानना है कि यह खोज मध्य प्रदेश में कुपोषण से लड़ने का सबसे सस्ता और टिकाऊ तरीका बन सकती है। साथ ही “बैम्बू बियॉन्ड बॉर्डर्स” की सोच के तहत राष्ट्रीय बांस मिशन से जुड़कर जनजातीय युवाओं को अगर बांस के फर्नीचर के साथ-साथ फूड प्रोडक्ट बनाने की ट्रेनिंग दी जाए, तो जंगल के उत्पाद से ही स्थायी आय का रास्ता खुलेगा।

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