
बालाघाट, जिले की पावन धरा पुरातात्विक महत्वपूर्ण अवशेषों से विशालतम रुप में समृद्ध शाली रहा है, जहाँ 10 वीं शं., 11 वीं शं. कलचुरी कालीन संस्कृति, धार्मिकता गौरवशाली इतिहास मिलता है। तथागत पुरातात्विकविद् ,इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान संग्रहालय बालाघाट के संग्रहाध्यक्ष डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार ने व्यक्त करते हुए बताया कि अपनी संस्कृति अपनी पहचान है, उस समय के राजा-महाराजाओं धर्म परायण थे, जिन्होंने पत्थरों की प्रतिमाएं कलाकारों के माध्यम से विभिन्न देवी-देवताओं की कलात्मक कृतित्वयां बनवाई थी। इसी परिदृश्य में प्रथम पूज्य गणेश की विभिन्न रुपेण गणेश की प्रतिमाएं आस्था-विश्वास के बन वाकर मंदिरों में स्थापन करवाया था। समयानुसार राजा-महाराजाओं का राज्य परिवर्तित होता गया।
जो हिन्दुत्व को न मानने वालों ने प्रतिमाओं क्षतिग्रस्त कर दिया था। आज परिप्रेक्ष्य में बालाघाट जिले के वनांचल भू-भाग, ग्रामिणोंचंल में यत्र-तत्र भग्नावशेष देखने को मिलते है। इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान संग्रहालय बालाघाट में दो चतुर्भुज गणेश, मूषक वाहन पाषाण दुर्लभ अवशेष संग्रहित कर रखा गया। इसके अतिरिक्त लालबर्रा क्षेत्र के ग्राम बोरी में एक पत्थर के चारों ओर गणेश प्रतिमा को बनाया गया, गोंगलई ग्राम में किसान के खेत में असुरक्षित गणेश प्रतिमा रखी हुई है, देवी तालाब की खुदाई के दौरान गणेश प्रतिमा निकली थी, जो गणेश मंदिर में स्थापित है, लांजी किले में गणेश प्रतिमा, ग्राम मोरिया में गणेश प्रतिमा, ग्राम मऊ (चांगोटोला) में नृत्यांग गणेश प्रतिमा रखी हुई। डाॅ.वीरेन्द्र सिंह गहरवार ने बताया वर्तमान परिवेश गणेश प्रतिमाओं को संरक्षित करने की आवश्यक प्रतीत होती है, अन्यथा इतिहास के पन्नों में पढ़ा जायेगा, गणेश की प्रतिमा बालाघाट आंचल में थी।
