अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों में उन कार्रवाइयों का हवाला दिया जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 242 और 338 के समर्थन में की गई पिछली प्रतिबद्धताओं को कमजोर करती हैं। विदेश विभाग ने पीए और पीएलओ पर अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में कानूनी कार्रवाई के माध्यम से “इज़रायली-फ़िलिस्तीनी संघर्ष का अंतर्राष्ट्रीयकरण” करने की कोशिश करने, वार्ताओं के बजाय एकतरफा मान्यता की मांग करने और आतंकवाद के दोषी ठहराए गए लोगों को वजीफे देना जारी रखने तथा सार्वजनिक बयानों एवं स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में आतंकवाद का महिमामंडन करने का भी आरोप लगाया। विदेश विभाग ने गुरुवार को जारी एक बयान में कहा, “अमेरिका से किए गए वादों के बावजूद सुधार न करने और शांति की संभावनाओं को कमजोर करने वाली लगातार गतिविधियों के कारण, अमेरिका पीएलओ सदस्यों और पीए अधिकारियों को वीज़ा न देने वाले प्रतिबंधों को आगे भी जारी रखेगा।”
ये उपाय पश्चिम एशिया शांति प्रतिबद्धता अधिनियम की धारा 604(a)(1) के तहत लागू किए जा रहे हैं। विभाग ने कहा कि वह पीएलओ पर्यवेक्षक मिशन को संयुक्त राष्ट्र में नियुक्त किए गए कर्मियों के लिए स्थायी छूट बनाए रखेगा, जैसा कि पहले के अमेरिकी निर्णयों में था। यह ताज़ा निर्णय न्यूयॉर्क में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की सालाना बैठक से पहले आया है। अमेरिकी अधिकारियों ने अलग से पुष्टि की है कि फ़िलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास भी उन लोगों में शामिल हैं जिन पर वीज़ा पाबंदियां लगाई गई हैं; इसका अर्थ है कि वह लगातार दूसरे साल इस बैठक में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हो पाएंगे।विदेश विभाग ने कहा कि इन उपायों का उद्देश्य पीएलो और पीए पर कार्रवाई करना और उन्हें उस बातों के लिए जवाबदेह ठहराना है जिसे वॉशिंगटन ने आतंकवाद का महिमामंडन करार दिया है।

