स्मार्टफोन वाले दौर में भी फीकी नहीं पड़ी 1956 की परंपरा

सतना:ब्लैक एंड व्हाइट के जमाने से शुरू हुआ सफर अब डिजिटल रील तक पहुंचा, बुजुर्गों के तजुर्बे और युवाओं के नए जोश का गवाह बना महाराष्ट्र मंडल का गणेशोत्सव।

वक्त बदला, तकनीक बदली और देखते ही देखते हमारा शहर भी पूरी तरह बदल गया। लेकिन इन सबके बीच पिछले 70 सालों से जो एक चीज़ बिल्कुल नहीं बदली, वह है महाराष्ट्र मंडल के गणेश पंडाल में उमड़ने वाली गहरी श्रद्धा। सन् 1956 में महाराष्ट्र से सतना आए 6 परिवारों ने मिलकर यहां पहली बार गणेश उत्सव की शुरुआत की थी। इसी दौर से सतना शहर में सार्वजनिक स्तर पर गणेश उत्सव मनाने की परंपरा को मजबूती मिली। सतना में महाराष्ट्र मंडल की स्थापना स्वर्गीय पुरुषोत्तम अनंत परांजपे ने की थी। उनके साथ 6 परिवारों ने मिलकर मंडल की गतिविधियों को आगे बढ़ाया। इस मंडल ने पहली बार सतना में बाप्पा की स्थापना की थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि आज के डिजिटल युग में भी यह उत्सव समाज को एक धागे में पिरोने का सबसे बड़ा जरिया बना रहेगा। इस साल का आयोजन सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के खूबसूरत मिलन की एक नई कहानी कह रहा है।

रील्स जनरेशन संभाल रही है विरासत

इस साल पंडाल में जो सबसे खूबसूरत और नया बदलाव दिख रहा है, वह है शहर के युवाओं का जोश। जो युवा दिनभर सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम रील्स में व्यस्त रहते हैं, वे बाप्पा के दरबार में आकर पारंपरिक धोती-कुर्ता और नौवारी साड़ी पहने पूरी श्रद्धा से व्यवस्था संभाल रहे हैं। ढोल-ताशों की थाप पर थिरकते और आरती में हाथ जोड़े खड़े इन युवाओं को देखकर साफ है कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों को भूली नहीं है।

किचन से लेकर मैनेजमेंट तक महिलाएं आगे

उत्सव में महिलाओं और बेटियों की भागीदारी एक नए रूप में सामने आई है। वे सिर्फ पूजा की थालियां सजाने या महाप्रसाद बनाने तक सीमित नहीं हैं। पंडाल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के मैनेजमेंट और यहाँ तक कि ढोलक (ग्रुप) का नेतृत्व महिलाओं और बेटियां द्वारा किया जा रहा हैं। यह नयापन दिखाता है कि समाज को जोड़ने और उत्सव को भव्य बनाने में महिलाओं का नेतृत्व कितना मजबूत हुआ है।

70 वर्षों का यह सफर गवाह है कि सतना का महाराष्ट्र मंडल आज भी लोकमान्य तिलक की उसी सोच को जिंदा रखे हुए है, जिसका मकसद गणेश उत्सव के बहाने पूरे समाज को एक करना था। यह भव्यता और नयापन वाकई पूरे सतना जिले के लिए गौरव की बात है।

इस बार 2 फीट की प्रतिमा 15 साल के बच्चे प्रणव जोशी की गोद में आए हैं। प्रतिमा को बच्चों की टोली में शामिल प्रांजलि जोशी, प्रवेश कारकिडे, प्रगति कारकिडे, परिधि धुले, सूर्यांश पुराणिक और यशस्वी घोरपडे ने सजाया है।

प्रदीप घुले ने बताया कि राजेंद्र नगर का गणेश उत्सव अब केवल बुजुर्गों की यादों और पुरानी परंपराओं तक सीमित नहीं रह गया है। आयोजन में नई पीढ़ी भी बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभा रही है। करीब सात दशक पहले कुछ परिवारों ने जिस छोटी-सी पहल के साथ गणेशोत्सव की शुरुआत की थी, आज उनकी अगली पीढ़ी उसी विरासत को पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रही है।

संजय महादानी ने बताया कि राजेंद्र नगर में गणेशोत्सव की शुरुआत वर्ष 1956 में कुछ परिवारों की सामूहिक पहल से हुई थी। उस समय उत्सव का स्वरूप बेहद सीमित था, लेकिन परिवारों के आपसी सहयोग, एकजुटता और बप्पा के प्रति गहरी आस्था ने इसे निरंतर आगे बढ़ाया। सात दशक बाद आज यह आयोजन एक समृद्ध परंपरा का रूप ले चुका है और हर वर्ष उसी श्रद्धा, उत्साह और सामूहिक सहभागिता के साथ गणेशोत्सव मनाया जा रहा है।

महेश काकिरदे ने बताया कि गणेशोत्सव हमारे लिए महज धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि परिवारों और समाज को एक-दूसरे से जोड़ने का माध्यम भी है। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए पिछले चार-पांच वर्षों से मिट्टी की गणेश प्रतिमा का ड्रम में विसर्जन किया जा रहा है। प्रतिमा के घुलने के बाद प्राप्त मिट्टी को दोबारा उपयोग में लाते हुए उससे पौधों के गमले तैयार किए जाते हैं। इस पहल के जरिए उत्सव के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जा रहा है।

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