
जबलपुर। सनातन धर्म की रक्षा और उसके पुनर्जागरण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज की 103वीं जयंती पर उनकी तपस्या, संघर्ष और कृतित्व का स्मरण हो रहा है। 1923 में हरतालिका तीज के दिन जन्मे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने बाल्यकाल से ही संन्यास का मार्ग अपनाया और युवा अवस्था में स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करते हुए उन्होंने जेल यात्राएं कीं। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने गौसेवा, धर्मप्रचार और सनातन की सेवा को जीवन का ध्येय बनाया। वर्ष 1973 में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य और 1984 में द्वारका-शारदा पीठ के शंकराचार्य के रूप में अभिषिक्त होकर वे देश के चार सर्वमान्य पीठों में से दो पीठों के आचार्य बनने वाले पहले शंकराचार्य बने।
बेहद स्नेहपूर्ण व्यक्तित्व था
राम मंदिर आंदोलन में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। राम के अस्तित्व और रामसेतु से जुड़े विवादों पर उन्होंने तत्कालीन केंद्र सरकार के रुख का खुलकर विरोध किया और मंदिर के पक्ष में प्रमाण व कानूनी लड़ाई को मजबूती देने में भूमिका निभाई। समाज की असहाय, परित्यक्त और विधवा महिलाओं के सम्मानजनक पुनर्वास के लिए अखिल भारतीय उभय भारती महिला आश्रम की स्थापना भी उनके सेवा-भाव का उदाहरण है। धर्मसम्राट की प्रतिष्ठा के बावजूद उनका व्यक्तित्व बेहद सहज और स्नेहपूर्ण था। ब्रह्मलीन हुए तीन वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन सनातन के प्रति उनका समर्पण, उनकी विचारधारा और स्नेहिल स्मृतियां आज भी समाज के बीच जीवंत हैं। ऐसी विभूतियां वास्तव में युगों-युगांतर में जन्म लेती हैं।
