भोपाल। धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने सम्यक दर्शन के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि समस्त कल्याण का बीज सम्यक दर्शन है। यह मोक्षमार्ग की आधारशिला है। जिस प्रकार नाव को सही दिशा देने के लिए खेवटिया की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मोक्षमार्ग की नाव भी सम्यक दर्शन के मार्गदर्शन में ही आगे बढ़ सकती है।
आचार्य श्री ने कहा कि केवल ज्ञान अर्जित कर लेना अथवा बाहरी रूप से चारित्र का पालन करना पर्याप्त नहीं है। ज्ञान की वास्तविक उत्कृष्टता तभी प्राप्त होती है, जब उसके साथ सम्यक दर्शन हो। उन्होंने साधकों से अपने श्रद्धान को दृढ़ और सुरक्षित रखने तथा आगम के अनुरूप आचरण करने का आह्वान किया।
उन्होंने ख्याति, पूजा और लाभ की इच्छा से सावधान करते हुए कहा कि ज्ञान के माध्यम से प्रशंसा और प्रतिष्ठा प्राप्त करना आध्यात्मिक विकास नहीं है। धार्मिक क्षेत्र में फोटो, प्रचार और स्वयं को प्रमुखता से प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। उन्होंने कहा, “लाइट में रहो, हाईलाइट होने की आवश्यकता नहीं है।” वीआईपी बनने अथवा स्वयं को विशेष दिखाने की चाह साधना में बाधक हो सकती है।
आचार्य श्री ने दान में विवेक पर जोर देते हुए कहा कि दाता और पात्र दोनों का कल्याण होना चाहिए। उन्होंने कर्मों के निश्चित परिणाम का स्मरण कराते हुए साधकों को सत्य का बार-बार चिंतन करने और उसे जीवन में उतारने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि ख्याति के पीछे भागने के बजाय अपने श्रद्धान को सुरक्षित रखना ही साधक का वास्तविक पुरुषार्थ है।
