
अज़हर खान
जबलपुर। सन 1996 की शुरुआत से लेकर 10 सितंबर 2026 तक पूरे 30 साल बीत चुके हैं, लेकिन जेल की सलाखों को ठेंगा दिखाकर फरार हुए बंदियों का पुलिस आज तक एक कतरा सुराग भी नहीं जुटा पाई है। घड़ी की सुइयां टिक-टिक कर आगे बढ़ रही हैं, इन 30 सालों में जो सिपाही 1996 में इन कैदियों को ढूंढ रहे थे, उनमें से कब के रिटायर होकर पेंशन ले रहे हैं और फरार बंदियों की फाइलें आज भी उसी तरह धूल फांक रही हैं, जैसे 1996 में थीं। इन 10, 957 दिनों में पुलिस सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाती रही। नेताजी सुभाष चंद्र बोस सेंट्रल जेल के करीब 14 बंदियों को आखिर जमीन निगल गई या आसमान? यह वह सुलगता हुआ सवाल हैै। जिसने जेल महकमे से लेकर पुलिस मुख्यालय तक के होश उड़ा दिए हैं। कैदियों ने नियमों को ठेंगा दिखा दिया है। अब इनका कहीं कोई सुराग नहीं मिल रहा है। सच तो यह है कि जो अपराधी पहले ही पुलिस, जेल प्रशासन की नाक के नीचे से गायब हो गए, उन्हें ढूंढना अब भूसे के ढेर में सूई तलाशने जैसा है। रिकॉर्ड बताते हैं कि इन फरार बंदियों में सिर्फ छोटे-मोटे चोर- उचक्के नहीं, बल्कि संगीन मामलों के दोषी और विचाराधीन कैदी भी शामिल हैं। 30 सालों में पुलिस की कई टीमें बदलीं, फाइलें एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर घूमती रहीं, समय बीतने के साथ इन मामलों में पुलिस की सक्रियता भी कम होती गई फाइलें रिकॉर्ड रूम की धूल फांकने लगीं और नतीजा शून्य रहा।
क्या वे जिंदा भी हैं?
जानकार बताते हैं कि 30 साल के इस लंबे अंतराल में मुमकिन है कि इन कैदियों में से किसी की मौत भी हो चुकी हो। जिसका वजूद है भी या नहीं, खुद पुलिस को नहीं पता। 1996 में पुलिस के पास इनकी जो तस्वीरें थीं, आज वो किसी काम की नहीं हैं। इतने लंबे समय में कई अपराधियों का हुलिया पूरी तरह बदल चुका होगा। तीन दशक पहले अपराधियों के केवल हाथ से बने स्केच या धुंधली तस्वीरें ही पुलिस के पास थीं। आज की तारीख में उनका मिलान करना लगभग नामुमकिन है। 30 साल में कुछ नौजवान अपराधी बूढ़ा हो चुका होगा। ऐसा भी हो सकता है कि आज हमारे और आपके बीच नाम बदलकर कोई रह रहा हो? मुमकिन है कि आपका पड़ोसी ही 1996 का वो खूंखार भगोड़ा हो जिसे पुलिस ढूंढ रही है।
कोई पैरोल तो कोई हिरासत से गायब-
गंभीर अपराधों में सजा काट रहे कई बंदी पैरोल (अस्थाई रिहाई) पर जेल से बाहर आने के बाद रहस्यमयी ढंग से गायब हो गए। पैरोल की तय अवधि समाप्त होने के बाद भी इन कैदियों ने जेल में आत्मसमर्पण नहीं किया। नियम के मुताबिक पैरोल की अवधि खत्म होने पर इन्हें खुद सरेंडर करना था। कुछ बंदी ऐसे भी हैं जो जेल प्रशासन की हिरासत को तोडक़र चकमा देकर भाग निकले।
परिजनों का रटा-रटाया जवाब, टीमें गठित, दबिश पर नतीजा शून्य-
गायब कैदियों पर थाने में एफआईआर भी दर्ज कराई गई है बल्कि कैदियों की रिहाई के वक्त जिन लोगों ने उनकी जमानत ली थी उन्हें भी आरोपी बनाया गया लेकिन हाथ खाली रहे। पुलिस जब कैदियों के घर पहुंचती तो कई मामलों मेंं परिजन हाथ खड़े कर कहते हैं कि हमें नहीं पता वह कहां है। पुलिस की जांच में पैरोल से भागे कैदियों के परिजन साफ कहते है कि रिहाई के बाद से उनका कैदी से कोई संपर्क नहीं हुआ है या वह जेल जाने की बात कहते हुए घर से निकल गए। अब सवाल उठता है कि क्या जेल से भेजने से पहले इन अपराधियों के नेटवर्क की कोई जांच नहीं की गई थी? अगर ये फरार अपराधी बाहर किसी बड़ी वारदात को अंजाम देते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? पुलिस ने भले ही फरार बंदियों को दबोचने के लिए विशेष टीमों का गठन किया है और उनके संभावित ठिकानों पर लगातार दबिश का दावा भी कर रहती है लेकिन आलम यह है कि पुलिस हवा में लाठियां भांज रही है, अब देखना यह है कि पुलिस इन गायब हो चुके खूंखार अपराधियों को कब तक दोबारा सलाखों के पीछे पहुंचा पाती है।
इनका कहना है
सन 1996 के बाद से लगभग 30-35 सालों में 50 बंदी फरार थे जिसमें से काफी बंदियों को गिरफ्तार कर लिया गया है 14 बंदी लगभग अभी भी फरार हैं। जिनकी पूरी जानकारी सिविल लाइन थाने को दी जाती है सिविल लाइन थाने पर जानकारी उपलब्ध है एवं पुलिस द्वारा लगातार उनको गिरफ्तार कर जेल दाखिल करने के लिए प्रयास किया जाता है।
मदन कमलेश, उप अधीक्षक, जेल
