आईएफएफजेके के समापन समारोह में उमर ने प्रदेश को फ़िल्म केंद्र के तौर पर पेश किया

श्रीनगर, (वार्ता) जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने गुरुवार को कहा कि प्रदेश को केवल फिल्मों की शूटिंग के पसंदीदा स्थल तक सीमित रखने के बजाय कहानी लिखने, फिल्म निर्माण और प्रतिभाओं के विकास के एक जीवंत केंद्र के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।

श्री अब्दुल्ला ने डल झील के किनारे एसकेआईसीसी में आयोजित चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव जम्मू-कश्मीर (आईएफएफजेके) के समापन समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही। इस महोत्सव में फिल्म निर्माण और कहानी कहने की कला का जश्न मनाने के लिए फिल्म निर्माता, कलाकार और सिनेमा प्रेमी एकत्र हुए।

इस अवसर पर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला, जम्मू-कश्मीर के मंत्रिपरिषद के सदस्य, मुख्यमंत्री के सलाहकार, जम्मू-कश्मीर के कई विधायक, मुख्य सचिव, भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव तथा नागरिक और पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

फिल्म निर्माताओं, कलाकारों, निर्णायक मंडल के सदस्यों, भारत और विदेश से आए प्रतिनिधियों, छात्रों, युवा फिल्म निर्माताओं तथा सिनेमा प्रेमियों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आईएफएफजेके के पहले संस्करण ने यह साबित किया है कि जम्मू-कश्मीर में सिनेमा के लिए एक सार्थक नया मंच तैयार करने के विचार को दर्शक और उद्देश्य दोनों मिले हैं।

उन्होंने कहा, “चार दिन पहले हम यहां जम्मू-कश्मीर के पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का पर्दा उठाने के लिए एकत्र हुए थे। उस समय यह महोत्सव एक ऐसा विचार था, जिसे आजमाया जा रहा था। एक निमंत्रण, एक प्रयोग और सबसे बढ़कर यह उम्मीद कि जम्मू-कश्मीर सिनेमा के लिए एक सार्थक नया मंच बना सकता है। आज रात, जब इसका पहला संस्करण समाप्त हो रहा है, हम कह सकते हैं कि इस विचार को दर्शक और उद्देश्य दोनों मिल गए हैं।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि इन चार दिनों में आईएफएफजेके ने फिल्म निर्माताओं और दर्शकों को एक साथ लाया, स्थापित पेशेवरों को युवा प्रतिभाओं से जोड़ा और ऐसा मंच तैयार किया, जहां जम्मू-कश्मीर का सिनेमा भारत और दुनिया के साथ जुड़ सका।

उन्होंने कहा कि प्रदेश के युवाओं की भागीदारी विशेष रूप से उत्साहजनक रही। महोत्सव के दौरान कहानी कहने, फिल्म निर्माण की कला, तकनीक और सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

श्री अब्दुल्ला ने 30 से अधिक देशों की 120 फिल्मों की भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि महोत्सव का यह विस्तार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका वास्तविक महत्व अलग-अलग पृष्ठभूमि और सिनेमा की यात्रा के अलग-अलग चरणों से जुड़े लोगों के बीच बने संबंधों में है।

उन्होंने कहा, “किसी युवा लेखक की किसी निर्देशक से मुलाकात, किसी उभरते फिल्म निर्माता का किसी पेशेवर से सीखना या यहां दो ऐसे लोगों का मिलना, जो एक दिन मिलकर फिल्म बना सकते हैं।”

महोत्सव के दौरान सम्मानित और पुरस्कृत किए गए लोगों को बधाई देते हुए मुख्यमंत्री ने निर्णायक मंडल, फिल्म निर्माताओं, प्रतिनिधियों, फिल्म जगत, आयोजकों, स्वयंसेवकों और दर्शकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इन सभी की भागीदारी ने महोत्सव के पहले संस्करण को ऊर्जा और सार्थकता प्रदान की।

उन्होंने महोत्सव के दौरान कश्मीर से जुड़ी प्रतिष्ठित फिल्मों को डल झील के किनारे वापस लाए जाने के भावनात्मक महत्व को भी रेखांकित किया।

उद्घाटन समारोह में जम्मू-कश्मीर के सिनेमा से लंबे जुड़ाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ‘जंगली’, ‘आरजू’, ‘कश्मीर की कली’ और ‘कभी कभी’ जैसी फिल्मों का प्रदर्शन उसी प्राकृतिक परिवेश के सामने किया गया, जिसने इन फिल्मों को यादगार बनाने में मदद की थी।

मुख्यमंत्री ने कहा, “दशकों तक कश्मीर सिनेमा के पर्दे के जरिए दर्शकों तक पहुंचता रहा। इस सप्ताह एक अर्थ में सिनेमा का पर्दा वापस कश्मीर आ गया।” उन्होंने तैरते सिनेमा को आईएफएफजेके के पहले संस्करण की सबसे खास यादों में से एक बताया।

हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल पुरानी यादें जम्मू-कश्मीर में सिनेमा के भविष्य को तय नहीं कर सकतीं।

उन्होंने कहा, “हमारी महत्वाकांक्षा केवल एक खूबसूरत फिल्म शूटिंग स्थल बने रहने से आगे की होनी चाहिए। जम्मू-कश्मीर को तेजी से ऐसा स्थान बनना चाहिए, जहां से कहानियां निकलें, प्रतिभाओं की खोज हो और फिल्मों की कल्पना तथा निर्माण किया जाए।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के पास अपने प्राकृतिक दृश्यों के अलावा सिनेमा को देने के लिए बहुत कुछ है। उन्होंने क्षेत्र के शहरों, कस्बों और गांवों, भाषाओं, साहित्य, संगीत, हस्तशिल्प, इतिहास और रोजमर्रा के जीवन को कहानियों का समृद्ध स्रोत बताया।

उन्होंने कहा, “हमारे प्राकृतिक दृश्य फिल्म निर्माताओं को यहां ला सकते हैं, लेकिन हमारी कहानियां, हमारे लोग और पेशेवर फिल्म निर्माण का माहौल उन्हें दोबारा यहां ला सकता है।”

व्यापक फिल्म जगत के साथ दोतरफा संबंध की जरूरत पर जोर देते हुए श्री अब्दुल्ला ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य हिस्सों और दुनिया भर से फिल्म निर्माताओं का स्वागत जारी रखना चाहिए। साथ ही स्थानीय प्रतिभाओं के लिए भी ऐसे अवसर पैदा करने चाहिए, जहां उन्हें क्षेत्र से बाहर दर्शक, सहयोगी और अवसर मिल सकें।

उन्होंने युवाओं में निवेश को विशेष महत्व दिया और कहा कि आईएफएफजेके की दीर्घकालिक सफलता का आकलन केवल प्रदर्शित फिल्मों या इसमें शामिल हुई हस्तियों की संख्या से नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “दस साल बाद आईएफएफजेके की सफलता का आकलन केवल दिखाई गई फिल्मों या हमारे साथ शामिल हुई हस्तियों से नहीं होगा, बल्कि इससे शुरू हुए करियर, इससे पैदा हुए अवसरों और सहयोग तथा जम्मू-कश्मीर की उन कहानियों से होगा, जो भारत और दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंचीं।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि फिल्म निर्माताओं और कलाकारों की मौजूदगी ने आईएफएफजेके के पहले संस्करण को प्रतिष्ठा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि उनके योगदान के लिए सबसे सार्थक श्रद्धांजलि यही होगी कि महोत्सव के दौरान पैदा हुई प्रेरणा और अवसरों को आगे बढ़ाया जाए और जम्मू-कश्मीर की नई पीढ़ी को सिनेमा में अपना स्थान बनाने में मदद की जाए।

उन्होंने आईएफएफजेके को हर साल होने वाले चार दिवसीय कार्यक्रम से आगे बढ़ाकर पूरे वर्ष स्क्रीनिंग, सीखने, प्रशिक्षण और सहयोग के लिए निरंतर मंच के रूप में विकसित करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि महोत्सव का भविष्य का स्वरूप इसमें भाग लेने वाले लोगों और दर्शकों के अनुभवों तथा उनकी प्रतिक्रिया के आधार पर तय किया जाना चाहिए। श्री अब्दुल्ला ने कहा, “सरकार मंच और अनुकूल माहौल उपलब्ध करा सकती है, लेकिन एक जीवंत फिल्म संस्कृति को खुद रचनात्मक समुदाय द्वारा कायम रखा जाना चाहिए।”

 

 

 

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