लोकायुक्त की छोटी मछली पर कार्रवाई से काम नहीं चलेगा, शीर्ष अधिकारियों की भूमिका की भी हो निष्पक्ष जांच :भटनागर 

पन्ना, केन-बेतवा लिंक परियोजना के नाम पर विस्थापित हो रहे ग्रामीणों, किसानों और आदिवासियों के साथ हो रही कथित अनियमितताओं तथा भ्रष्टाचार के दावों पर गुरुवार को लोकायुक्त की कार्रवाई ने मुहर लगा दी है। सागर लोकायुक्त की टीम ने जनवार-गहदरा क्षेत्र के पटवारी संतोष चिकवा को 47,000 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों धर दबोचा। इस बड़ी कार्रवाई के बाद से ही परियोजना क्षेत्र और प्रशासनिक महकमे में हड़कंप का माहौल बना हुआ है। मामले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जय किसान संगठन के नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने कहा है कि यह कार्रवाई केवल भ्रष्टाचार की शुरुआत को दर्शाती है, अंत को नहीं। उन्होंने मांग की है कि जांच को केवल एक निचले स्तर के कर्मचारी तक सीमित न रखकर पूरे नेटवर्क और उसमें शामिल वरिष्ठ अधिकारियों तक बढ़ाया जाना चाहिए।

अमित भटनागर ने कहा कि केन-बेतवा परियोजना में प्रभावित आदिवासियों और किसानों की अशिक्षा, सरलता तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी न होने का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर धांधली की जा रही है। पटवारी संतोष चिकवा भ्रष्टाचार के इस विशाल नेटवर्क का केवल एक हिस्सा है। जांच एजेंसियों को यह खंगालना होगा कि यह रिश्वत किसके कहने पर मांगी गई, इसे किसका संरक्षण प्राप्त था और मुआवजा वितरण में ऊपर तक कौन-कौन लोग शामिल हैं। सामाजिक कार्यकर्ता ने स्पष्ट किया कि प्रभावित ग्रामीण लंबे समय से जमीन के सर्वे, परिसंपत्तियों के गलत मूल्यांकन, नामांतरण और पुनर्वास राशि को लेकर शिकायतें दर्ज करा रहे हैं। ऐसे में इस मामले की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच बेहद अनिवार्य हो जाती है। उन्होंने मांग की है कि जांच एजेंसियां मुआवजा प्रकरणों और जमीन के राजस्व रिकॉर्ड्स की पुनः समीक्षा करें। इसके साथ ही सर्वे रिपोर्ट, ग्रामसभा सहमति पत्र और परिसंपत्ति मूल्यांकन से जुड़े दस्तावेजों का आपस में मिलान किया जाए। मामले में यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी या राजनीतिक संरक्षण की भूमिका सामने आती है, तो उन पर भी सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। भटनागर ने आगे कहा कि संगठन विकास विरोधी नहीं है, लेकिन विकास की आड़ में गरीब विस्थापितों के हक पर डाका डालने वाली व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई जारी रहेगी। विस्थापन का दंश झेल रहे आदिवासियों की मजबूरी को रिश्वतखोरी का अवसर बनाना पूरी तरह अक्षम्य है। लोकायुक्त की इस कार्रवाई को प्रवेश-बिंदु बनाकर सरकार को पूरी मुआवजा व पुनर्वास प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके।

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