नई दिल्ली। मोबाइल से लेकर कार तक… टीवी, फ्रिज और AC से लेकर 5G नेटवर्क और रक्षा तकनीक तक- हर जगह एक छोटी सी चिप बेहद अहम भूमिका निभाती है। लेकिन सवाल है, आखिर भारत इस छोटी सी चिप के लिए 1.27 लाख करोड़ रुपये का बड़ा दांव क्यों लगा रहा है?
सेमीकंडक्टर चिप को इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का दिमाग कहा जाता है। यही चिप डेटा को प्रोसेस करने और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को नियंत्रित करने में मदद करती है।
आज भारत अपनी जरूरत की ज्यादातर चिप विदेशों से खरीदता है। कोविड के दौरान जब दुनियाभर में चिप की कमी हुई, तो इसका असर कारों और इलेक्ट्रॉनिक सामान के उत्पादन पर भी पड़ा। इसने दिखाया कि चिप के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कितनी बड़ी चुनौती हो सकती है।
इसी निर्भरता को कम करने के लिए सरकार ने Semicon 2.0 को मंजूरी दी है। अगले छह साल में 1.27 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। लक्ष्य सिर्फ चिप की फैक्ट्री लगाना नहीं, बल्कि चिप डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, टेस्टिंग और रिसर्च से जुड़ी पूरी वैल्यू चेन को भारत में विकसित करना है।
क्योंकि आधुनिक कारों में बैटरी, सेंसर और सुरक्षा सिस्टम से लेकर 5G नेटवर्क और रक्षा उपकरणों तक चिप की जरूरत है। लेकिन चुनौती आसान नहीं—चिप फैक्ट्रियां बेहद महंगी हैं, तकनीक जटिल है और लगातार बिजली, पानी और विशेषज्ञों की जरूरत होती है।
यानी दांव सिर्फ चिप बनाने का नहीं… भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता का है। अब देखना होगा – क्या ये निवेश भारत को चिप आयात करने वाले देश से एक बड़े चिप मैन्युफैक्चरिंग हब में बदल पाएगा?
