नई दिल्ली। आज दुनिया की राजनीति को सिर्फ संसद, चुनाव और नेताओं के भाषणों से नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे एक और बड़ी ताकत काम कर रही है- वैश्विक अर्थव्यवस्था।सोचिए… दुनिया के किसी हिस्से में युद्ध होता है, तो ऊर्जा और कच्चे माल की कीमतों पर असर पड़ सकता है। तेल महंगा होता है, तो देशों का आयात बिल बढ़ता है, महंगाई पर दबाव आता है और सरकारों पर जनता को राहत देने का दबाव बढ़ता है।
इसी तरह टैरिफ और व्यापार प्रतिबंध अब सिर्फ आर्थिक फैसले नहीं रह गए हैं। बड़े देश अपने व्यापार और तकनीकी नीतियों के जरिए अपनी रणनीतिक ताकत भी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यानी अर्थव्यवस्था और विदेश नीति का रिश्ता अब पहले से ज्यादा गहरा हो चुका है।दूसरी तरफ, जब महंगाई बढ़ती है या विकास की रफ्तार कमजोर होती है, तो सरकारों के सामने बड़ा सवाल होता है- जनता को राहत दें या सरकारी खर्च और आर्थिक अनुशासन के बीच संतुलन बनाएं?
यही वजह है कि आज तेल, व्यापार, ब्याज दर, सप्लाई चेन और टेक्नोलॉजी जैसे मुद्दे सीधे राजनीति से जुड़ गए हैं।कुल मिलाकर, जिस देश की अर्थव्यवस्था जितनी मजबूत और लचीली होगी, उसके पास वैश्विक राजनीति में उतना ही बड़ा विकल्प और प्रभाव होगा। यानी 21वीं सदी की राजनीति में सत्ता सिर्फ संसद में नहीं… आर्थिक ताकत के जरिए भी तय होती है।
