‘कस्तूरी’ में शब्दों के साथ सवाल और समाधान भी : पराडक़र

ग्वालियर। साहित्य का सृजन लोकमंगल के लिए होना चाहिए। अच्छे साहित्य के लिए शब्दों का समृद्ध भंडार आवश्यक है। कवयित्री व्याप्ति उमड़ेकर के कविता संग्रह ‘कस्तूरी’ में शब्दों की समृद्धता के साथ प्रश्न भी हैं और उनके समाधान भी हैं। यह बात अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संरक्षक श्रीधर पराडक़र ने रविवार को होटल सुखसागर में आयोजित ‘कस्तूरी’ के लोकार्पण समारोह में अध्यक्षीय उद्बोधन में कही।

साहित्य अकादमी मध्य प्रदेश, संस्कृति परिषद एवं संस्कृति विभाग द्वारा प्रथम कृति प्रकाशन के लिए चयनित व्याप्ति उमड़ेकर के कविता संग्रह ‘कस्तूरी’ का लोकार्पण मुख्य अतिथि आकाशवाणी ग्वालियर के कार्यक्रम अधिकारी सुमित गौतम, विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मध्य क्षेत्र के क्षेत्र कार्यकारिणी सदस्य यशवंत इंदापुरकर और माधव महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. शिवकुमार शर्मा की विशिष्ट आतिथ्य में हुआ। सारस्वत अतिथि राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की कुलगुरु डॉ. स्मिता सहस्त्रबुद्धे रहीं।

श्री पराडक़र ने दिल्ली में जेन-जी आंदोलन के दौरान गाली-गलौज को कुछ वरिष्ठजनों द्वारा समर्थन दिए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह भारतीय संस्कृति नहीं है। मुख्य अतिथि सुमित गौतम ने कहा कि दुनिया में सबसे ज्यादा खतरनाक यदि कुछ है तो वह विचार है। नकारात्मक विचार लाखों लोगों की जिंदगी तबाह कर सकता है। इसलिए सकारात्मक साहित्य और पुस्तकें लिखी जानी चाहिए। उन्होंने ‘कस्तूरी’ की सराहना करते हुए कहा कि निश्चित रूप से इसकी सुगंध पूरे भारत में व्याप्त होगी।

यशवंत इंदापुरकर ने कहा कि व्याप्ति का यह साहित्य लोकव्याप्ति का साहित्य है। डॉ. शिवकुमार शर्मा ने कहा कि व्याप्ति उमड़ेकर की काव्य कृति उच्च भावों को दर्शाती है। डॉ. स्मिता सहस्त्रबुद्धे ने कृति की सराहना करते हुए इसे संगीतमय रूप में प्रस्तुत करने की बात कही और इसके लिए सहयोग का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में स्वागत भाषण विष्णु उमड़ेकर ने दिया। संचालन कादंबरी आर्य ने एवं आभार प्रतिभा उमड़ेकर ने व्यक्त किया।

‘कस्तूरी’ में झलकता है आत्मबोध’

कविता संग्रह ‘कस्तूरी’ की समीक्षा करते हुए माधव महाविद्यालय की प्राध्यापक एवं हिंदी साहित्य सभा की साहित्य मंत्री डॉ. मंदाकिनी शर्मा और कवयित्री डॉ. करुणा सक्सेना ने कहा कि व्याप्ति उमड़ेकर की कृति में आत्मबोध स्पष्ट रूप से झलकता है। कृति में निराशा के बजाय संघर्ष की भावना है। ‘कस्तूरी’ इसी आंतरिक चेतना और जीवन-संघर्ष को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करती है।

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