इंदौर:सानंद न्यास के पांच दर्शक समूह के लिए डॉ गिरीश ओक अभिनीत नाटक ‘आता थांबवायचं कसं?’ का मंचन शनिवार शाम से प्रारंभ हुआ.दरअसल, मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियां चलाते हुए हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि आभासी दुनिया में दर्ज किया गया एक क्षण वास्तविक जीवन में कितनी दूर तक हमारा पीछा कर सकता है. एक तस्वीर, एक वीडियो, एक संदेश या महज एक क्लिक, क्षण भर की असावधानी कभी-कभी जीवन की दिशा बदल देने वाली घटना बन जाती है. निजी और सार्वजनिक के बीच की रेखा जब धुंधली पड़ने लगती है, तब तकनीक सुविधा से आगे बढ़कर संकट का रूप ले लेती है. ‘आता थांबवायचं कसं ?’ इसी भयावह संभावना को एक मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी के माध्यम से रंगमंच पर साकार करता है.
अरुण और रमा पिंपलकर का परिवार बाहर से देखने पर बिल्कुल हमारे-आपके परिवार जैसा है, सुखी, सहज और आत्मीय. बेटी तन्वी, बेटा चिराग और अरुण की मां के साथ जीवन अपनी लय में आगे बढ़ रहा है. तन्वी के विवाह में महज पंद्रह दिन शेष हैं. घर में उत्सव का वातावरण है, तैयारियों की चहल-पहल है और आने वाले सुखद भविष्य के सपने हैं. तभी तन्वी से हुई एक चूक इस पूरे संसार को जैसे एक झटके में तहस-नहस कर देती है. जो घर कुछ क्षण पहले हंसी से भरा था, वहां भय, तनाव, सामाजिक दबाव और असमंजस का अंधेरा उतर आता है। ‘अब आगे क्या ?’ का प्रश्न पात्रों के साथ दर्शक के भीतर भी बेचैनी पैदा करता है।
लेखक-निर्देशक संदीप दंडवते की विशेषता यह है कि वे इस घटना को केवल तकनीक के दुष्परिणाम के रूप में नहीं देखते. उनके लिए असली प्रश्न तकनीक नहीं, उसके साथ बदलता मनुष्य है. सोशल मीडिया पर निजी जीवन को सहजता से सार्वजनिक कर देना, आभासी दुनिया में सीमाओं का विस्मरण, क्षणिक आवेग में निर्णय लेना और फिर उसके सामाजिक एवं मानसिक परिणामों से जूझना—नाटक इन सभी स्तरों को छूता है.आता थांबवायचं कसं ?’ का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह डिजिटल दुनिया को खारिज नहीं करता, बल्कि उसके साथ जिम्मेदारी से जीने की जरूरत रेखांकित करता है.
आज की युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच का अंतर समझने की जरूरत है, तो अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि बच्चों की हर गलती पर उन्हें अकेला छोड़ देना समाधान नहीं है। एक क्षण की डिजिटल असावधानी किस तरह पूरे परिवार को संकट में डाल सकती है और उसी संकट में परिवार की एकजुटता किस तरह उम्मीद का रास्ता खोल सकती है, नाटक इसी द्वंद्व को प्रभावी ढंग से सामने लाता है. इस अर्थ में ‘आता थांबवायचं कसं?’ केवल एक नाटक नहीं, हमारे समय के बदलते पारिवारिक और सामाजिक संबंधों का आईना है.कलाकार .. सुकन्या कुलकर्णी मोने, जान्हवी पणशीकर, आकाश पाटील, ऐश्वर्या शेटे आणि डॉ. गिरीश ओक
