
नईदिल्ली। सितंबर की बारिश को लेकर चिंता बढ़ रही है। जून की कमजोर शुरुआत, अगस्त में बारिश की कमी और अब सितंबर के लिए IMD का below-normal अनुमान… सवाल ये है कि इसका असर सोयाबीन, कपास और धान जैसी खरीफ फसलों पर कितना पड़ेगा और क्या इसका असर आम आदमी की रसोई तक पहुंचेगा? इस साल मानसून की शुरुआत बेहद कमजोर रही। जून में बारिश सामान्य से करीब 40 फीसदी कम रही और यह 1901 के बाद जून के सबसे सूखे महीनों में शामिल रहा। जुलाई में बारिश से कुछ सुधार हुआ, लेकिन अगस्त में फिर 16 फीसदी की कमी दर्ज की गई।
अब सितंबर पर नजर है।
IMD के मुताबिक सितंबर 2026 में देशभर में बारिश LPA यानी Long Period Average के 91 फीसदी से कम रहने की सबसे ज्यादा संभावना है।यानी मानसून के आखिरी महीने में भी बारिश सामान्य से कम रह सकती है। लेकिन तस्वीर हर जगह सूखे की नहीं है। IMD ने 3 से 5 सितंबर के दौरान मध्य प्रदेश में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी दी थी। पूर्वी मध्य प्रदेश में कुछ जगह अत्यधिक भारी बारिश का भी अलर्ट रहा। वहीं प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की गतिविधि कमजोर रहने का अनुमान दिया गया है।
यही असमान बारिश खेती के लिए बड़ी चुनौती है। सोयाबीन, कपास, धान, मक्का और दालों की फसलें इस समय विकास के अहम चरण में हैं। सितंबर में पर्याप्त नमी नहीं मिली तो उत्पादन पर असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ बहुत ज्यादा बारिश वाले इलाकों में जलभराव भी फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। इसका असर सिर्फ खरीफ तक सीमित नहीं रहेगा। सितंबर की मिट्टी की नमी गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलों की बुवाई के लिए भी अहम है। यानी कमजोर सितंबर आगे की खेती का गणित भी बिगाड़ सकता है और इसका सीधा कनेक्शन है किसान की आय और खाद्य महंगाई से।
अगर उत्पादन घटता है तो किसान की आमदनी पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं बाजार में सप्लाई कम हुई तो सोयाबीन से जुड़े खाद्य तेल, दालें और चावल जैसी चीजों की कीमतों पर दबाव आ सकता है।
जुलाई में खाद्य महंगाई 5.52 फीसदी थी। ऐसे में कमजोर मानसून से सप्लाई प्रभावित होती है तो आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों पर फिर दबाव बनने का जोखिम है। यानी सितंबर की बारिश का सवाल सिर्फ ये नहीं है कि आसमान कितना बरसेगा… सवाल ये है – कहां बारिश होगी, कितनी होगी और उसका पानी खेत तक कितना पहुंचेगा। क्योंकि इसका असर एक साथ फसल, किसान की कमाई और आम आदमी की रसोई —तीनों पर पड़ सकता है।
