17 गिरफ्तारियां, 26 ट्रक जब्त—फिर ‘बड़े नामों’ पर सवाल क्यों? बालाघाट का बड़ा चांवल घोटाला

बालाघाट, जिले के पुलिस अधीक्षक के द्वारा गठित एसआईटी की कार्रवाई में अब तक एवीजे एथेनॉल प्लांट के प्रतिनिधि राहुल प्रताप, सुपरवाइजर राकेश श्रीवास्तव, ट्रक चालक दुर्गेश शेंडे, ट्रांसपोर्टर उबेद खान, विभिन्न राइस मिलों से जुड़े संचालक एवं कर्मचारी तथा एफसीआई से जुड़े कर्मचारी सहित 17 आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है।

इसी क्रम में हर्ष राइस मिल से जुड़े अविनाश कावरे, विनोद शर्मा और गोपाल ठाकुर की गिरफ्तारी भी हुई है। हर्ष राइस मिल के राजनीतिक कनेक्शन को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। रिपोर्ट में भाजपा जिला अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री रामकिशोर कावरे के परिवार से जुड़े होने का उल्लेख किया गया है। हालांकि, किसी राजनीतिक या पारिवारिक संबंध मात्र से किसी व्यक्ति की आपराधिक भूमिका साबित नहीं होती।

यही वजह है कि इस मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल कार्रवाई की समानता को लेकर है—क्या जांच में जिन लोगों के खिलाफ साक्ष्य मिलेंगे, उनके पद, राजनीतिक प्रभाव या कारोबारी हैसियत से अलग समान कानूनी कार्रवाई होगी?

कुमार कावरे की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनके खिलाफ कार्रवाई की पुष्टि इस रिपोर्ट के स्तर पर नहीं है। इसलिए उनकी भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसी के साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

 

असली परीक्षा अब ‘सिस्टम’ की—क्या बाकी प्लांटों का भी होगा ऑडिट?

बालाघाट मामले ने केवल एक कथित चावल हेराफेरी की जांच को जन्म नहीं दिया है, बल्कि सरकारी खाद्यान्न की पूरी आपूर्ति व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।

यदि जांच में यह स्थापित होता है कि निर्धारित उद्देश्य के लिए जारी चावल का डायवर्जन हुआ, तो जिम्मेदारी केवल अंतिम स्तर पर चावल प्राप्त करने वालों तक सीमित नहीं रह सकती। आवंटन, उठाव, परिवहन, स्टॉक सत्यापन, दस्तावेजी प्रक्रिया और भुगतान—हर स्तर की भूमिका की जांच जरूरी होगी। इसीलिए अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या संबंधित एजेंसियां प्रदेश के अन्य एथेनॉल प्लांटों को जारी चावल का भी फॉरेंसिक स्टॉक ऑडिट और दस्तावेजी मिलान कराएंगी।

क्योंकि अगर एक प्लांट की जांच में हजारों मीट्रिक टन चावल का हिसाब सवालों के घेरे में आ सकता है, तो बाकी 21 प्लांटों का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक जांच की कसौटी पर क्यों नहीं परखा जाना चाहिए?

बालाघाट की जांच अब केवल चावल की बरामदगी का मामला नहीं रह गई है। यह सरकारी खाद्यान्न की निगरानी, एफसीआई की जवाबदेही, मिलिंग व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता की बड़ी परीक्षा बन चुकी है। अब असली सवाल यही है—क्या एसआईटी जांच की अगली कड़ी उन सभी स्तरों तक पहुंचेगी, जहां से सरकारी चावल की आवाजाही नियंत्रित होती है, या फिर कार्रवाई कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित रह जाएगी?

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