यातनाएं सहीं पर चन्द्रिका ने ब्रिटिश हुकूमत के सामने नहीं झुकाया सिर

जबलपुर: संस्कारधानी की वीर भूमि ने देश को कई ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दिए हैं जिन्होंने राष्ट्र की वेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इन्हीं महानायकों में से एक नाम पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी का है, माता-पिता की इकलौती संतान होने के बावजूद, उन्होंने कम उम्र में ही देश सेवा का जो मार्ग चुना, वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक महान प्रेरणा है। उन्होंने जिस तरह सुख- सुविधाओं को ठुकरा कर देश की आजादी के महायज्ञ में खुद को झोंक दिया, वह देशभक्ति की ऐसी मिसाल है जो आज भी युवाओं की रगों में राष्ट्रवाद का लहू दौड़ा देती है। महात्मा गांधी के आव्हान पर देश की आजादी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले और संसद से लेकर विधानसभा तक अपनी अमिट छाप छोडऩे वाले स्व. पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी के भीतर देश प्रेम कूट-कूट कर भरा था। उनकी शिक्षा जबलपुर में ही हुई। 10 फरवरी 1921 को जबलपुर के एक संभ्रांत परिवार में जन्मे चन्द्रिका प्रसाद के पिता स्व. फुन्दीलाल त्रिपाठी एक शिक्षाविद और नायब तहसीलदार थे। घर में राष्ट्रवाद का माहौल था।
स्व. पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी की राजनीतिक व सामाजिक विरासत को आगे बढ़ रहे उनके वंश पोते पं. सुकीर्थ त्रिपाठी ने नवभारत को बताया कि भारत को स्वाधीन करने के लिए महात्मागांधी द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन में दादा चन्द्रिका कम उम्र में ही कूद पड़े थे। जब साल 1939 में जबलपुर के ऐतिहासिक त्रिपुरी मैदान में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की अध्यक्षता में त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन हुआ, तब दादा ने एक ऊर्जावान स्वयंसेवक के रूप में मोर्चा संभाला। एक सक्रिय स्वयंसेवक के रूप में दिन-रात कार्य किया। नेताजी के विचारों और महात्मा गांधी के राष्ट्रव्यापी आव्हान ने उनके भीतर देशभक्ति की ऐसी अलख जगाई कि उन्होंने अपनी भविष्य की चिंता छोड़ पूरी तरह आजादी की लड़ाई में कूदने का संकल्प ले लिया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में जब देश में फिरंगियों के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ, तो पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी अग्रिम पंक्ति में खड़े नजर आए। उनकी बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों से घबराकर ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था उन्हें एक वर्ष के कड़े कारावास की सजा सुनाई गई। जेल की कालकोठरी में अंग्रेजों ने उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से तोडऩेे के लिए अमानवीय यातनाएं दीं लेकिन उनका हौसला अंग्रेजों की बंदूकों और लाठियों से कहीं ज्यादा मजबूत था। उन्होंने हंसते-हंसते हर दर्द सहा, पर फिरंगियों के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। अंग्रेजों की अमानवीय यातनाएं सहीं, लेकिन कभी घुटने नहीं टेके।
संसद तक गूंजी महाकौशल की आवाज-
स्व. स्वतंत्रता सेनानी पं. चन्द्रिका प्रसाद त्रिपाठी के वंश पं. सुकीर्थ त्रिपाठी ने बताया कि उनके दादा शुरू से ही कांग्रेस संगठन एवं राजनीति में सक्रिय रहे। वह वर्ष 1944-45 में जबलपुर तहसील कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद वे लगातार 22 वर्षों तक जबलपुर जनपद सभा के अध्यक्ष रहे, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड है। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए क्षेत्र की जनता ने उन्हें वर्ष 1957 से 1967 तक लगातार 10 वर्षों तक बरगी विधानसभा क्षेत्र का विधायक चुना। जमीन से जुड़े इस जननेता की काबिलियत को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी मिली। वे वर्ष 1984 से 1990 तक राज्यसभा के सांसद रहे। संसद में उन्होंने महाकौशल और मध्य प्रदेश के विकास की आवाज को पूरी प्रखरता के साथ बुलंद किया। देश की नीतियों को तय करने में बड़ी भूमिका निभाई। इसके अलावा वे नई दिल्ली में रेलवे बोर्ड के सदस्य रहे। फोर्ड फाउंडेशन सोसाइटी के सम्मानित सदस्य थे। जबलपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और कृषि उपज मंडी समिति के अध्यक्ष रहकर किसानों और आम जनता की भी सेवा की।

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