जबलपुर: शहर के प्रमुख जलस्रोतों में शामिल देवताल तालाब इन दिनों गंदगी और लापरवाही की गिरफ्त में नजर आ रहा है। तालाब के आसपास रहने वाले कुछ रहवासी घरों से निकलने वाले कचरे को सुविधानुसार तालाब के किनारे ही ठिकाने लगा रहे हैं। नतीजतन तालाब के आसपास जगह-जगह प्लास्टिक की पन्नियां, बोतलें, खाद्य सामग्री के पैकेट, डिस्पोजल और अन्य तरह का कचरा बिखरा नजर आता है। जिस जगह पर हरियाली, स्वच्छता और प्राकृतिक सुंदरता दिखाई देनी चाहिए, वहां कचरे के ढेर तालाब की खूबसूरती पर दाग लगा रहे हैं। स्थिति देखकर ऐसा लगता है कि कुछ लोगों ने देवताल के किनारों को अपने घर का ‘एक्सटेंशन कूड़ेदान’ मान लिया है। कचरा फेंकने के बाद लोग अपनी जिम्मेदारी से ऐसे मुक्त हो जाते हैं, जैसे कचरा तालाब में नहीं बल्कि उनकी समस्या से बाहर चला गया हो। लेकिन हकीकत यह है कि यह कचरा धीरे-धीरे पानी में पहुंचता है और फिर उसका खामियाजा पूरे जल तंत्र को भुगतना पड़ता है।
ज़िम्मेदारी लेने तैयार नहीं….
सबसे गंभीर चिंता तालाब में रहने वाले जलीय जीवों को लेकर है। प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट पदार्थ पानी में पहुंचने से जल की गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ-साथ मछलियों और अन्य जलीय जीवों के जीवन पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। पानी में सड़ने-गलने वाला कचरा दुर्गंध और प्रदूषण को बढ़ावा देता है, जबकि प्लास्टिक जैसी चीजें लंबे समय तक पानी और आसपास के वातावरण में बनी रहती हैं। तालाब के किनारे कचरे का जमाव केवल देखने में ही खराब नहीं लगता, बल्कि यह धीरे-धीरे पर्यावरणीय समस्या का रूप ले सकता है। दुर्भाग्य यह है कि लोग तालाब के पानी और पर्यावरण से मिलने वाले लाभ तो चाहते हैं, लेकिन उसे साफ रखने की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हैं। एक तरफ शहर में स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, दूसरी तरफ देवताल के किनारे यह तस्वीर उन अभियानों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही है। यहां जरूरत केवल लोगों को समझाइश देने की नहीं, बल्कि लगातार निगरानी और नियम तोड़ने वालों पर सख्ती की भी है।
जुर्माने की व्यवस्था जरूरी है
देवताल की सफाई व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। तालाब के बीच या चुनिंदा हिस्सों में कभी-कभार सफाई होती दिखाई देती है, लेकिन किनारों की स्थिति जस की तस बनी रहती है। यानी बीच में सफाई की चमक और किनारों पर गंदगी का अंधेरा—मानो सफाई अभियान भी तालाब के किनारे पहुंचते-पहुंचते थक जाता हो। यदि तालाब के बीच से कचरा निकाल दिया जाए और किनारे पर पड़े कचरे को वहीं छोड़ दिया जाए तो समस्या का समाधान कैसे होगा, यह समझ से परे है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सफाई केवल अभियान तक सीमित न रहकर नियमित व्यवस्था का हिस्सा बननी चाहिए। तालाब के चारों ओर नियमित कचरा उठाने की व्यवस्था, पर्याप्त डस्टबिन, सूचना बोर्ड, निगरानी और कचरा फेंकने वालों पर जुर्माने की व्यवस्था जरूरी है। इसके साथ ही आसपास के रहवासियों को भी यह समझना होगा कि तालाब किसी एक व्यक्ति या विभाग की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरे शहर की प्राकृतिक धरोहर है।
नियमित निरीक्षण हो
देवताल तालाब की स्थिति यह संदेश दे रही है कि केवल सफाईकर्मियों के भरोसे शहर को स्वच्छ नहीं बनाया जा सकता। जब तक नागरिक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक एक ओर सफाई होगी और दूसरी ओर उसी जगह फिर कचरा जमा होता रहेगा। प्रशासन चाहे जितनी बार सफाई कराए, यदि अगले ही दिन किनारे पर फिर कचरे के ढेर लग जाएं तो सारी मेहनत और संसाधन बेकार चले जाएंगे। इसलिए अब जरूरत ‘सफाई अभियान’ से आगे बढ़कर ‘सफाई की स्थायी व्यवस्था’ बनाने की है। तालाब के किनारों पर कचरा फेंकने वालों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाए, नियमित निरीक्षण हो और स्थानीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था बनाई जाए। आखिर देवताल को स्वच्छ रखना केवल नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की भी जिम्मेदारी है जो इसके आसपास रहते हैं और इसकी प्राकृतिक सुंदरता का लाभ उठाते हैं। वरना जिस तालाब के किनारे कभी स्वच्छता और प्रकृति की तस्वीर दिखाई देनी चाहिए थी, वहां कचरे के ढेर ही हमारी कथित ‘जागरूकता’ की कहानी सुनाते नजर आएंगे।
