
बालाघाट, कलेक्ट्रेट कार्यालय बालाघाट के जनसुनवाई हॉल का माहौल रोज़ की तरह गहमागहमी से भरा था। लोग अपनी-अपनी समस्याओं के आवेदन हाथों में थामे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। इन्हीं के बीच लांजी तहसील के ग्राम उमरी की निवासी दिव्यांग देवेश्वरी हरिनखेड़े भी पहुंची थी। आंखों में उम्मीद और चेहरे पर परिवार की चिंताओं की लकीरें लिए वह केवल अपने हक की नहीं, बल्कि अपने बुजुर्ग मां-बाप के जीवन के सहारे की गुहार लेकर आई थी।
देवेश्वरी को दिव्यांग पेंशन योजना के तहत हर महीने मात्र 600 रुपये मिलते हैं। उस पर सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि देवेश्वरी के कंधों पर अपने 70 वर्ष से अधिक आयु के वृद्ध माता-पिता के पालन-पोषण की पूरी ज़िम्मेदारी है। वह खुद शारीरिक रूप से सक्षम न होने के बावजूद अपने माता-पिता के लिए सहारा बनना चाहती थी, लेकिन आय का कोई स्थाई जरिया न होने से उसकी राहें बेहद कठिन थीं।
जनसुनवाई के दौरान जब कलेक्टर श्री कुमार सत्यम की नज़र देवेश्वरी पर पड़ी, तो उसकी स्थिति देखकर वे खुद चलकर उसके पास पहुंचे। कलेक्टर को अपने सामने पाकर देवेश्वरी भावुक हो गई। उसने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा कि अगर उसे रोजगार का कोई छोटा-मोटा ज़रिया मिल जाए, तो वह अपने वृद्ध माता-पिता की बेहतर देखभाल कर सकती है। देवेश्वरी की संघर्षपूर्ण कहानी और उसके दृढ़ संकल्प को कलेक्टर श्री कुमार सत्यम ने बेहद ध्यान से सुना। उसकी समस्या सुनने के बाद उन्होंने न केवल उसे मदद का भरोसा दिया, बल्कि तुरंत फैसला भी सुनाया।
कलेक्टर श्री कुमार ने मौके पर मौजूद प्रभारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. ऋत्विक पटेल को बुलाया और लांजी के सिविल अस्पताल की ओपीडी में आउटसोर्स के माध्यम से देवेश्वरी को सेवा देने का अवसर प्रदान करने का निर्देश दिया। इसके बाद उन्होंने देवेश्वरी से कहा, “आपको शीघ्र ही सूचना दी जायेगी और उसके बाद आप सिविल अस्पताल लांजी की ओपीडी में मरीजों की पर्ची बनाने का काम शुरू कर दीजिए।”
कलेक्टर श्री कुमार की इस त्वरित पहल और संवेदनशीलता को देखकर देवेश्वरी की आंखें खुशी और कृतज्ञता के आंसुओं से छलक उठीं। जो देवेश्वरी कुछ ही देर पहले निराशा और असमंजस के बादलों से घिरी थी, अब वह अपने परिवार का स्वाभिमान से पालन-पोषण करने का संबल पाकर एक नया सपना आंखों में सजाए मुस्कुरा रही थी। प्रशासन की इस सहृदयता ने न केवल एक दिव्यांग बेटी को आत्मनिर्भरता की राह दिखाई, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि जब संवेदनशीलता और कर्तव्य का मेल होता है, तो किसी का पूरा जीवन संवर जाता है।
