रैली में दिखी आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत

इंदौर: विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रविवार को आदिवासी समाज की ओर से भव्य रैली निकाली गई. लालबाग से शुरू हुई यह रैली राजीव गांधी चौराहे तक पहुंची रैली में हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग शामिल हुए। पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, सिर पर सजी कलगी और लोक संस्कृति की झलक ने पूरे आयोजन को आकर्षक बना दिया.

विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर निकली इस रैली में इंदौर की सड़कों पर आदिवासी समाज की समृद्ध परंपरा और सांस्कृतिक विरासत देखने को मिली. पारंपरिक वेशभूषा, सांस्कृतिक प्रतीकों और उत्साह के साथ शामिल हुए लोगों ने अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का संदेश दिया. रैली के माध्यम से आदिवासी समाज ने अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और सामाजिक एकता को प्रदर्शित किया. बड़ी संख्या में महिला, पुरुष और युवा पारंपरिक परिधानों में नजर आए. ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर लोग उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहे.

पारंपरिक वेशभूषा में दिखी गोंड संस्कृति की झलक
रैली में शामिल दीक्षा उईके ने पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा धारण की थी। उन्होंने बताया कि उन्होंने गोंड संस्कृति से जुड़े पारंपरिक कपड़े पहने हैं. सिर पर लगाई गई कलगी के बारे में उन्होंने बताया कि यह आदिवासी राजाओं द्वारा पहनी जाने वाली पारंपरिक पहचान का हिस्सा रही है. उन्होंने कहा कि इस तरह की वेशभूषा के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.

बड़े त्योहार से कम नहीं आदिवासी दिवस
दिग्गी ठाकुर, सरपंच ग्राम उखलदा, ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस आदिवासी समाज के लिए बहुत बड़ा पर्व है. इसे समाज के लोग उत्साह, उमंग और गर्व के साथ मनाते हैं. उन्होंने कहा कि यह दिन आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं और पहचान को दुनिया के सामने रखने का अवसर देता है.

संस्कृति जीवित रखना प्रत्येक पीढ़ी की जिम्मेदारी
रैली में अंकलेश राणा भी पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में शामिल हुए. उन्होंने आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं के बारे में जानकारी साझा करते हुए कहा कि अपनी संस्कृति को जीवंत रखना प्रत्येक पीढ़ी की जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन समाज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं

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