इंदौर: मेरे दोनों पैर काट दिए गए, लेकिन मेरे विचारों की दिशा नहीं काटी जा सकी. मेरा शरीर घायल हुआ, मेरा संकल्प नहीं.प्रख्यात शिक्षाविद्, चिंतक एवं राज्यसभा सांसद सी. सदानंदन मास्टर ने इंदौर में अपने जीवन की उस त्रासदी को याद करते हुए यह बात कही. उन्होंने कहा कि 1994 में कन्नूर में राजनीतिक हिंसा का शिकार होने के बाद लंबे उपचार और कृत्रिम पैरों के सहारे उन्होंने जीवन को फिर खड़ा किया, लेकिन संघ से मिले आत्मविश्वास, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के स्नेह और समाज के सहयोग ने उन्हें कभी निराशा अथवा असहायता के भाव में नहीं जाने दिया. संस्था सार्थक द्वारा आयोजित प्रेरक व्याख्यान में संघर्ष से संसद तकः वैचारिक प्रतिबद्धता विषय पर बोलते हुए सदानंदन मास्टर ने अपने जीवन के संघर्ष, कन्नूर की राजनीतिक परिस्थितियों, वैचारिक यात्रा, संघ से जुड़ाव और राज्यसभा तक पहुंचने के अनुभवों को साझा किया. आयोजन में उनके संबोधन के बाद एंकर हार्दिक दवे ने उनसे संवाद किया, जिसमें उनके जीवन के उन पहलुओं पर भी सवाल हुए, जो सामान्यतः किसी सार्वजनिक परिचर्चा का हिस्सा नहीं बनते. उन्होंने विशेष रूप से संस्था के प्रमुख दीपक जैन टीनू के प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्हें ऊर्जावान युवा कार्यकर्ता बताया. कार्यक्रम में संस्था सार्थक के अध्यक्ष नितेश मुच्छाल के साथ संस्था के सदस्य पंकज जैन, अमित सोनी, सिद्धार्थ निखरा, नितिन जोशी आदि उपस्थित रहे. संचालन विशाल डकोलिया ने किया. आभार अंकित रावल ने मानाा.
जीवन के अनुभव विचारों को देते हैं आकार
सदानंदन मास्टर ने अपनी वैचारिक यात्रा को जीवन के अनुभवों से जोड़ते हुए बताया कि विचार केवल पढ़ने-सुनने से नहीं बनते, बल्कि जीवन के अनुभव उन्हें आकार देते हैं. उन्होंने कहा कि संघ से जुड़ने के बाद उनके भीतर राष्ट्र, समाज और व्यक्ति के संबंध को देखने की दृष्टि में व्यापक परिवर्तन आया. वे शिक्षा के क्षेत्र से आए और शिक्षक के रूप में लंबे समय तक कार्य किया।
अपने संबोधन में सदानंदन मास्टर ने मध्यप्रदेश और इंदौर से अपने आत्मीय संबंध का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि इंदौर आना, यहां उपस्थित लोगों से मिलना और उनके साथ समय बिताना उनके लिए परम सौभाग्य है
