बालाघाट
जिले के तिरोड़ी से अजीबोगरीब मामला सामने आया है, जिसका हल तहसीलदार, एसडीएम तो दूर आईएएस रैंक के पास भी नहीं है. दरअसल, पिता विदेशी (चीनी) है और मां भारतीय अब बच्चों को नागरिकता तो मिल गई लेकिन जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है. इस पूरे मामले को समझने से पहले आपको वांग ची की कहानी समझनी पड़ेगी कि वह भारत कैसे आया और एक युद्ध बंदी की शादी भारतीय महिला से कैसे हुई ।
बालाघाट में एक परिवार आज भी अपनी पहचान के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है । इस परिवार में पिता चीनी है और मां भारतीय हैं उनके बच्चों को नागरिकता तो मिल गई लेकिन जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है । दरअसल, 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध के युद्ध बंदी को सात साल जेल में रखने के बाद बालाघाट के तिरोड़ी में छोड़ दिया गया, जहां पर कुछ साल रहने के बाद स्थानीय लोगों ने तिरोड़ी की ही एक महिला से उसकी शादी करवा दी । अब उनके बच्चे हुए तो उन्हें जन्म और मां की भारतीयता के आधार पर उन्हें भारत की नागरिकता तो मिली लेकिन उनका दो पीढ़ियों के बाद भी जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है । सभी अफसरों ने एक ही तरह का जवाब दिया ।
उनका कहना है कि भारत एक पुरुष प्रधान देश है, जहां पर विवाह के बाद पत्नी और बच्चों की जाति भी पिता के जाति के आधार पर तय होती है । ऐसे में उनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन सकेगा । अब वांग ची के बेटे विष्णु का कहना है कि पिता के चीनी होने की सजा अब मुझे और मेरे बच्चों को मिल रही है ।
बात 1 जनवरी 1963 की है, जब भारत चीन के युद्ध के खात्मे के बाद चीनी सैनिक वांग ची भटक कर भारत की सीमा में दाखिल हो गए थे । ऐसे में भटकते-भटकते उन्हें रेडक्रॉस की गाड़ी मिली। वांग ची उनसे कहते रहे कि मैं गलती से इस तरफ आ गया हूं, लेकिन उनकी किसी न सुनी । उन्हें भारतीय सेना को सौंप दिया गया । इसके बाद उन्हें असम स्थित दिसपुर छावनी ले जाया गया. हफ्ते भर रखने के बाद उन्हें पूछताछ के लिए दिल्ली भेज दिया गया । दिल्ली में उन्हें एक और चीनी सैनिक थुसूयु योंग मिले । फिर यहां से उन्हें अजमेर की जेल में भेज दिया गया । वहां दो साल नौ महीने रहे फिर पंजाब की केंद्रीय जेल वाफा, फिर एमपी के बालाघाट में छोड़ उन्हें वतन वापसी न करने की बात कह रिहा कर दिया गया ।
बच्चों के जाति प्रमाण पत्र बनाने के लिए सालों से संघर्ष
ऐसे में वह पुलिस कर्मियों की मदद से तिरोड़ी में बस गए । यहीं पर उन्हें काम मिल गया, जिसके बाद वहीं पर गांव की सुशीला बाई से शादी हुई । यहीं से उनकी कहानी बदल गई । शादी के बाद सुशीला बाई और वांग ची को चार बच्चे हुए जिनका नाम अनीता वांग, श्याम वांग, विष्णु वांग और आशा वांग । उनके बड़े बेटे श्याम वांग का निधन हो चुका है । अक्टूबर 2017 में उनकी पत्नी सुशीला बाई की मौत हो चुकी है । भले ही वक्त बीत गया है लेकिन घांव अब वैसे के वैसे ही है ।
बच्चों का नहीं बन रहा जाती प्रमाणपत्र
अपने बच्चों के जाति प्रमाण पत्र के लिए वांग ची के बेटे विष्णु दफ्तरों के चक्कर लगा रहे है । वांग ची के बेटे विष्णु वांग का कहना है कि 14 साल की कनक नवमी में पढ़ रही है. वहीं, भाई भी आठ साल का है. ऐसे में विष्णु अपने बच्चों के जाति प्रमाण पत्र बनाने के लिए सालों से संघर्ष कर रहे है । अब अफसरों के गोल मोल जवाब से वह परेशान हो गए है । उनका कहना है कि वह उनका जन्म 1981 में हुआ था । उनके पिता चीनी सैनिक थे, तब उन्हें नागरिकता जन्म और माता के भारतीय होने के आधार पर मिली । विष्णु का कहना है कि स्कूल में जाते थे तब माता की जाति को दर्ज किया गया था ।
ओबीसी होने की शर्तों को पूरी करता है वांग परिवार
विष्णु का कहना है कि पिता भले ही चीनी हो लेकिन हमने माता जी की जाति अपनाई थी । ऐसे में वह भी उसी रीति रिवाज को मानते हैं. माता के रिश्तेदार भी हमारे रिश्तेदार है । ऐसे में माता की जाति को ही माना जाता है. विष्णु कहते हैं कि उनका जन्म भी 1981 में हुआ । ऐसे में 1984 से पहले के निवासी होने की भी शर्तें पूरी करता हूं । ऐसे में सरकार को हमारा जाति प्रमाण पत्र बनाकर देना चाहिए । इसके लिए उन्होंने जनसुनवाई में, सीएम हेल्पलाइन सहित तमाम जगह पर शिकायत की है. ऐसे में कही से कोई मदद नहीं मिल रही है ।
वो चाइनिज है कैसे प्रमाण पत्र बना – एसडीएम
कटंगी एसडीएम कैलाश चंद्र ठाकुर ने मामले में कहा भारत पुरुष प्रधान देश है, तो मां के आधार पर जाति प्रमाण पत्र कैसे बनवाएं । वैसे भी वो चाइनीज है उनको कैसे जाति प्रमाण पत्र दें ।
इनका कहना है
अपर कलेक्टर जीएस धुर्वे का कहना है कि शासन के वर्तमान नियमों के अनुसार जाति प्रमाण पत्र पिता की जाति के आधार पर जारी किया जाता है । चूंकि यह मामला असाधारण परिस्थितियों से जुड़ा है, इसलिए शासन से मार्गदर्शन और आवश्यक निर्देश प्राप्त करने के लिए पत्र भेजा जाएगा ।
बच्चे पहचान के हकदार
इस मामले में कानूनी विशेषज्ञ एडवोकेट वर्णन श्रीवास्तव से मामले पर चर्चा की गई तो उनका कहना है कि भारतीय संविधान समानता पर आधारित है. संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 प्रत्येक व्यक्ति को समानता, भेदभाव से संरक्षण तथा गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान करते हैं । संविधान किसी भी अधिकार का निर्धारण केवल पिता की पहचान के आधार पर नहीं करता । ऐसे में जिम्मेदार अधिकारियों को साक्ष्य और तथ्यों का परीक्षण करना चाहिए. पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर जबरन निर्णय थोपना उन बच्चों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है
बच्चों का क्या कसूर
पिता चीनी तो बच्चों का क्या कसूर विष्णु वांग का कहना है कि अगर मेरे पिता चीनी है, तो हम बच्चों का क्या कसूर है. अब मेरे भी दो बच्चों का जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है. ऐसे में भारत सरकार हमारी मदद नहीं कर पा रही है और तो हम सब को चीन छोड़ दे. विष्णु के पिता वांग ची ने भी अपील की है कि उनके चीनी होने की सजा उनके बच्चों और नाती को न दे ।
