
बालाघाट, बारिश के मौसम में घने जंगलों से निकलने वाली एक दुर्लभ सब्जी इन दिनों बालाघाट के चुनिंदा बाजारों की शोभा बढ़ा रही है। नाम है ‘पटपुड़ा’ या ‘पुटू’। यह सब्जी साल में सिर्फ एक बार और वह भी करीब 45 दिन ही मिलती है।
*जंगल में ढूंढने में लग जाता है लंबा समय*
ग्रामीणों के अनुसार पटपुड़ा आसानी से नहीं मिलता। इसे पाने के लिए बैगा आदिवासी समुदाय के लोग घने जंगल में जाते हैं। पहले उन्हें सरई का पेड़ ढूंढना पड़ता है। उसी पेड़ के नीचे जमीन के भीतर पटपुड़ा उगता है। फिर उसकी खुदाई कर इसे शहरों के बाजार तक लाया जाता है। इसी वजह से इसे दुर्लभ सब्जी कहा जाता है।
*आदिवासियों की आय का बड़ा जरिया*
सरई के पेड़ के नीचे मिलने वाला पटपुड़ा आदिवासियों के लिए आय का महत्वपूर्ण साधन है। वनोपज पर निर्भर आदिवासी समुदाय बारिश के दिनों में पटपुड़ा बेचकर कमाई करता है। बाजार में इसकी कीमत 800 रुपये से 1200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। मांग अधिक होने के कारण यह हाथों-हाथ बिक जाता है।
*स्वाद में लाजवाब, सेहत के लिए भी फायदेमंद*
स्थानीय लोग मानते हैं कि पटपुड़ा की सब्जी का स्वाद इतना लाजवाब है कि चिकन-मटन भी फीका लगने लगे। इसे खास रेसिपी से बनाकर चावल या रोटी के साथ खाया जाता है।
पोषण की दृष्टि से भी यह बेहद फायदेमंद है। यह प्रोटीन और विटामिन डी का अच्छा स्रोत माना जाता है। इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, हृदय स्वस्थ रहता है और आयरन से खून की कमी भी दूर होती है। शाकाहारियों के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है।
कहते हैं साल में एक बार इस तरह की जंगली सब्जी जरूर खानी चाहिए।
