भोपाल: देश में जब भी बाघों की बात होती है, तो सबसे पहले नाम मध्यप्रदेश का आता है। यही वजह है कि मध्यप्रदेश को ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है। लेकिन यह पहचान एक दिन में नहीं बनी। वर्षों की मेहनत, बेहतर वन प्रबंधन और लगातार संरक्षण के प्रयासों ने प्रदेश को यह गौरव दिलाया है।1973 में शुरू हुए ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के बाद मध्यप्रदेश ने बाघों के संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर काम किया। जंगलों की सुरक्षा, शिकार पर सख्ती, टाइगर रिजर्व का विस्तार और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार किया गया। इन प्रयासों का परिणाम आज पूरी दुनिया के सामने है।
2022 की ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में 785 बाघ हैं, जो देश में सबसे अधिक हैं। प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 135, कान्हा में 105, पेंच में 77, पन्ना में 54 और सतपुड़ा में 52 बाघ हैं। खास बात यह है कि एक समय बाघों से खाली हो चुके पन्ना टाइगर रिजर्व को दोबारा बाघों से आबाद करना देश के सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण अभियानों में गिना जाता है।
टाइगर रिजर्व सिर्फ बाघों के संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रदेश के पर्यटन की भी पहचान बन चुके हैं। हर साल लाखों पर्यटक बांधवगढ़, कान्हा, पेंच, पन्ना और सतपुड़ा पहुंचते हैं, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है और प्रदेश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि आगामी बाघ गणना में मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या 1,000 के करीब पहुंच सकती है। उन्होंने कहा कि वन्यजीव संरक्षण प्रदेश सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। सरकार बाघों के साथ-साथ नदियों में घड़ियालों के संरक्षण पर भी लगातार काम कर रही है, ताकि प्रदेश की जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन सुरक्षित रह सके।
हालांकि, बढ़ती बाघों की संख्या के साथ नई चुनौतियां भी सामने हैं। जंगलों का संरक्षण, वन्यजीव कॉरिडोर को सुरक्षित रखना, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना और प्राकृतिक आवासों को बचाना भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारियां हैं।
मध्यप्रदेश आज सिर्फ सबसे ज्यादा बाघों वाला राज्य नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता और इको-टूरिज्म का राष्ट्रीय मॉडल बन चुका है। यही वजह है कि पूरे देश में मध्यप्रदेश गर्व के साथ “टाइगर स्टेट” के नाम से जाना जाता है।
