
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण से जुड़े प्रकरणों की सातवें दिन गुरुवार को भी सुनवाई जारी रही। हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद पाठक व जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष हुई सुनवाई दौरान सर्व प्रथम ओबीसी आरक्षण के विरोध में दायर सभी मामलों में सुनवाई हुई, जिसके पश्चात् ओबीसी आरक्षण के समर्थन तथा आबादी के अनुपात में आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर विचार हुआ।
याचिकाकर्ता संस्था एडवोकेट यूनियन फॉर डेमोक्रेसी एंड सोशल जस्टिस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर व अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने दलील दी कि मध्य प्रदेश में सभी वर्गों को सिर्फ ओबीसी आरक्षण से ही आपत्ति है। उन्होंने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी 15.6 फीसदी है, जबकि इनका आरक्षण 16 फीसदी है। अनुसूचित जनजाति की आबादी 21.01 फीसदी व आरक्षण 20 फीसदी है। वहीं सामान्य वर्ग की आबादी महज 13 फीसदी है, जबकि इन्हें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ईडब्ल्यूएस के नाम पर 10 फीसदी आरक्षण है। जबकि ओबीसी की आबादी 51 फीसदी है, लेकिन इन्हें आरक्षण मात्र 14 फीसदी ही है। तर्क दिया गया कि जब सरकार ने ओबीसी आरक्षण बढ़ाकर 27 फीसदी किया, तो सवर्ण वर्ग द्वारा व्यापक विरोध करते हुए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सैकड़ों याचिकाएं दाखिल कर दी गईं, जिनमें मध्य प्रदेश सरकार के जिम्मेदार अधिकारी भी शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने आज तक कोर्ट को यह स्पष्ट नहीं किया है कि किस फार्मूले के तहत आरक्षण का प्रतिशत तय किया गया है और अनुपातिक प्रतिनिधित्व की परिभाषा क्या है। इसके साथ ही न्यायालय को बताया गया कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 15(6) एवं 16(6) के तहत लागू किया गया हैए जिसके अनुसार इसका लाभ सभी वर्गों के गरीबों को मिलना चाहिए। किंतु मध्य प्रदेश शासन ने नीति जारी कर इसे केवल सवर्ण वर्ग के गरीबों तक सीमित कर दिया है, जो असंवैधानिक है। इसके अलावाए ईडब्ल्यूएस एक स्पेशल आरक्षण है जिसे नियमित: हॉरिजॉन्टल लागू किया जाना चाहिए था, परंतु इसे गलत तरीके से लागू किया गया है। जिससे प्रत्येक वर्ग को निर्धारित कोटे में 10 फीसदी सीटों का नुकसान हो रहा है। हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई आगामी 28 जुलाई को नियत की है।
