कोलकाता, (वार्ता) पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 21 जुलाई 1993 की गोलीबारी की घटना की 33वीं बरसी से कुछ दिन पहले न्यायाधीश सुशांत चट्टोपाध्याय आयोग की लंबे समय से लंबित रिपोर्ट सोमवार को विधानसभा में पेश की।
श्री अधिकारी ने इस रिपोर्ट के नतीजों को राज्य की सबसे विवादित राजनीतिक घटनाओं में से एक के पीछे की सच्चाई का पता लगाने की दिशा में एक अहम कदम बताया। विधानसभा अध्यक्ष के सामने रिपोर्ट पेश करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आयोग इस नतीजे पर पहुंचा है कि युवा कांग्रेस के प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी को सही नहीं ठहराया जा सकता और गोलीबारी में हुई मौतों को कानूनी रूप से जायज़ नहीं माना जा सकता। उनके मुताबिक, रिपोर्ट में कहा गया है कि गोलीबारी तत्कालीन गृह सचिव मनीष गुप्ता के आदेश पर की गयी थी। उन्होंने दावा किया कि आयोग को जानलेवा बल के इस्तेमाल को सही ठहराने वाला कोई ठोस सबूत नहीं मिला और पाया कि गोलीबारी बिना किसी ठोस उकसावे के और आसन्न खतरे के बजाय केवल खतरे की आशंका के आधार पर की गई थी। मुख्यमंत्री ने आयोग द्वारा पूछताछ किए गए गवाहों की सूची भी जारी की। उन्होंने बताया कि हालांकि 44 लोगों को बुलाया गया था, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिन्होंने 21 जुलाई, 1993 को यूथ कांग्रेस के मार्च का नेतृत्व किया था और लंबे समय से खुद को इस घटना का मुख्य गवाह बताती रही हैं से आयोग ने पूछताछ नहीं की।
श्री अधिकारी ने सुश्री बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि 21 जुलाई के शहीदों की याद का इस्तेमाल राजनीतिक और निजी फायदे के लिए किया गया, जबकि पूर्व गृह सचिव मनीष गुप्ता की भूमिका को जानबूझकर छिपाया गया।
उन्होंने कहा, “21 जुलाई की घटना का फ़ायदा कई लोगों ने उठाया। कुछ लोगों को राजनीतिक पद मिले, तो कुछ ने सत्ता के फ़ायदों का आनंद लिया। कुछ लोगों ने चार्टर्ड फ़्लाइट से यात्रा की, अमेरिका के जॉन्स हॉपकिन्स में इलाज करवाया, या हरीश चटर्जी स्ट्रीट और हरीश मुखर्जी स्ट्रीट पर बड़ी-बड़ी संपत्तियां बनाईं। फिर भी, पश्चिम बंगाल के लोगों को आज भी नहीं पता कि 21 जुलाई को असल में क्या हुआ था, पुलिस ने गोली क्यों चलाई, या गोली चलाने का आदेश किसने दिया था।”
श्री अधिकारी ने सवाल उठाया कि उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया और कहा कि इस चूक के लिए स्पष्टीकरण की ज़रूरत है। 21 जुलाई की घटना तब हुई थी जब युवा कांग्रेस वोटर पहचान पत्र लागू करने की मांग को लेकर राइटर्स बिल्डिंग तक मार्च कर रही थी। झड़प के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, जिसमें युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ता मारे गए। बाद में यह घटना तृणमूल कांग्रेस के लिए एक अहम राजनीतिक प्रतीक बन गई। 2011 में सत्ता में आने के बाद, तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस सरकार ने गोलीबारी की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशांत चट्टोपाध्याय की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया। हालांकि आयोग ने अपनी रिपोर्ट कई साल पहले ही सौंप दी थी, लेकिन सोमवार तक इसे सार्वजनिक नहीं किया गया था। रिपोर्ट का हवाला देते हुए श्री अधिकारी ने कहा कि आयोग ने शुरुआती जांच की पर्याप्तता पर सवाल उठाए और पाया कि कई ज़रूरी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं थे।
उन्होंने दावा किया कि रिपोर्ट में कहा गया है कि यह निश्चित तौर पर तय नहीं किया जा सका कि आखिर पुलिस गोलीबारी का आदेश किसने दिया था, और साथ ही ‘राइटर्स बिल्डिंग’ से ज़रूरी दस्तावेज़ गायब होने पर भी सवाल उठाए। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि 1993 की घटना में नाम आने के बावजूद, बाद में मनीष गुप्ता को तृणमूल कांग्रेस सरकार में शामिल किया गया, जिससे संकेत मिलता है कि राजनीतिक कारणों से रिपोर्ट जारी करने में देरी हुई। श्री अधिकारी ने घोषणा की कि अगर मारे गए या घायल लोगों के परिवार आयोग की रिपोर्ट में नामज़द किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ नयी प्राथमिकी दर्ज कराना चाहते हैं, तो राज्य सरकार इसमें कानूनी मदद देगी। उन्होंने विधानसभा को यह भी भरोसा दिलाया कि प्रभावित परिवारों को अतिरिक्त आर्थिक मदद देने के अनुरोधों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा। तृणमूल (ऋतब्रत गुट) के विधायक मदन मित्रा ने रिपोर्ट जारी होने का स्वागत किया और मुख्यमंत्री को धन्यवाद दिया कि उन्होंने एक “दबे हुए मुद्दे” को फिर से सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाया। उन्होंने सरकार से इस मामले पर श्वेत पत्र जारी करने और संबंधित जानकारी रखने वाले नागरिकों से आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा के सामने रखने का मकसद पारदर्शिता सुनिश्चित करना और जनता को जांच के नतीजों की समीक्षा करने का मौका देना था।
