नयी दिल्ली, 19 जुलाई (वार्ता) विभिन्न देशों के साथ व्यापार संधि और बढ़ती घरेलू मांग के मद्देनजर वस्त्र उद्योग की प्रमुख कंपनी आरएसडब्ल्यूएम लिमिटेड परिधान निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने पर विचार कर रही है। राजस्थान स्पिनिंग एंड वीविंग मिल के नाम से 1958 में राजस्थान के भिलवाड़ा में स्थापित कंपनी फिलहाल धागे और कपड़े बनाती है। आरएसडब्ल्यूएम के संयुक्त प्रबंध निदेशक राजीव गुप्ता ने समाचार एजेंसी ‘यूनीवार्ता’ को एक विशेष बातचीत में बताया कि भारत से धागा तथा कपड़ा बंगलादेश, श्रीलंका और वियतनाम को निर्यात किये जाते हैं। वे भारत से कपड़ा खरीदकर उसकी रंगाई करके उससे परिधान बनाते हैं और यूरोपीय तथा दूसरे बाजारों में बेचते हैं। अब तक भारत से जाने वाले सिले-सिलाये कपड़ों यानी परिधानों पर ब्रिटेन और यूरोपीय बाजारों में आठ से 12 प्रतिशत तक शुल्क लगता था। वहीं, बंगलादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका या वियतनाम से जाने वाले परिधानों पर कोई शुल्क नहीं लगता है। इसलिए, भारतीय निर्यातक प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते थे। उन्होंने कहा, “ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौता 15 जुलाई से प्रभावी हो गया है। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार संधि आठ-नौ महीने में लागू होने की उम्मीद है। कुल नौ एफटीए (या व्यापार संधि) हुए हैं। इन सबसे भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए लगभग 250 अरब डॉलर का बाजार खुला है, जहां पहले शुल्क के कारण हम पीछे थे।”
व्यापार संधियों से पैदा हुए अवसर को देखते हुए परिधान निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर श्री गुप्ता ने कहा, “हमारे लिए परिधान बनाना स्वाभाविक है और हम उस पर विचार कर रहे हैं। इस दिशा में हमारी कोई घोषित योजना नहीं है। हम इसमें जरूर आयेंगे। इसके पीछे व्यापार संधि तो एक कारण है ही, घरेलू मांग उससे भी बड़ा कारण है। देश की आबादी में हर साल ऑस्ट्रेलिया के बराबर आबादी जुड़ जाती है। सबसे ज्यादा युवा आबादी भी भारत में है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है।” उन्होंने कहा कि सरकार ने अगले पांच साल में 2030 तक वस्त्र निर्यात 37 अरब डॉलर से बढ़ाकर 100 अरब डॉलर पर और घरेलू कारोबार 130 अरब डॉलर से बढ़ाकर 250 अरब डॉलर पर पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। निर्यात जहां 47 अरब डॉलर पर पहुंचा है, वहीं घरेलू बाजार एक साल में 180 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। यह दिखाता है कि घरेलू बाजार किस तेजी से बढ़ रहा है। घरेलू बाजार के सामने चुनौतियों के बारे में श्री गुप्ता ने कहा कि इन व्यापार संधियों का पूरा फायदा भारत को तुरंत मिलना संभव नहीं है। इसका लाभ उठाने के लिए परिधान निर्माण की क्षमता बढ़ानी होगी क्योंकि उन देशों को सिले-सिलाये कपड़े चाहिये, लेकिन रास्ते निस्संदेह खुल चुके हैं। शुल्क के मामले में भेदभाव समाप्त हो गया है।
उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियों को अपने श्रमबल की गुणवत्ता पर काम करना होगा, मशीनों पर काम करना होगा, कौशल और उत्पादकता के स्तर को बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा, “इन मामलों में बंगलादेश और वियतनाम से हम बहुत पीछे हैं। बंगलादेश परिधान निर्माण का केंद्र बन चुका है, हमें अभी इस क्षेत्र में शुरुआत करनी है। दोनों देशों में वस्त्र उद्योग में प्रौद्योगिकी पर काफी निवेश किया गया है।” श्री गुप्ता ने कहा कि स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश में आज त्रिपुर सबसे आगे है, लेकिन वैश्विक स्तर पर यह अब भी काफी पीछे है। परिधान बनाने के जब बड़े प्लांट लगेंगे तब उत्पादकता भी बढ़ेगी। आरएसडब्ल्यूएम सालाना लगभग 5,000 करोड़ रुपये का कारोबार करती है। वह सिंथेटिक धागा, कपास के धागे और मिलाजियां नाम से एक मिश्रित धागा बनाती है। इसके अलावा कंपनी बेकार प्लास्टिक की बोतलों को रिसाइकिल करके उससे भी पॉलिस्टर धागा बनाती है। श्री गुप्ता ने बताया कि हर महीने 3,500 टन पॉलिस्टर धागा बनाया जाता है जिसके लिए रोजाना लगभग 60 लाख बोतलों को रिसाइकिल किया जाता है। यह धागा बिल्कुल सामान्य धागे की तरह होता है। उसके स्पर्श, मजबूती और लुक में दूसरे धागों से कोई अंतर नहीं होता। इसके अलावा कंपनी नीटेड फैब्रिक भी बनाती है। कंपनी दुनिया के 50 से अधिक देशों में धागों और कपड़ों का निर्यात करती है, हालांकि उसकी 50 प्रतिशत से ज्यादा बिक्री घरेलू बाजार में ही है।

