8 साल से नहीं मिला किसानों का हक, नहीं हुए मंडी समिति के चुनाव

सतना :की सभी कृषि उपज मंडियों में लोकतांत्रिक व्यवस्था पिछले आठ वर्षों से ठप पड़ी है। किसानों के हितों की रक्षा और उनकी समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए गठित कृषि उपज मंडी समितियों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से अब तक नए चुनाव नहीं कराए गए हैं। नतीजतन मंडियों का संचालन निर्वाचित किसान प्रतिनिधियों के बजाय व्यापारी जैसे चाहते है वैसे ही चलाते है मंडी के अधिकारी कठपुतली की तरह नाचते है।किसानों के हितों की रक्षा और कृषि उपज मंडियों के संचालन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से गठित कृषि उपज मंडी समिति पिछले करीब आठ वर्षों से बिना निर्वाचित प्रतिनिधियों के संचालित हो रही है।

समिति का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब तक चुनाव नहीं कराए गए हैं, जिससे किसानों का प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया है। वर्तमान में मंडी का संचालन प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से हो रहा है, जबकि समिति का मूल उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना, पारदर्शी नीलामी व्यवस्था सुनिश्चित करना, सही तौल, समय पर भुगतान, मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता और किसानों की शिकायतों का निराकरण करना है। किसानों के पास निर्वाचित समिति के अभाव में उनकी समस्याओं और मांगों को प्रभावी ढंग से रखने वाला कोई मंच नहीं बचा है, जिससे मंडी व्यवस्था में उनकी भागीदारी भी सीमित होकर रह गई है।

कृषि उपज मंडी समिति के आखिरी चुनाव वर्ष 2012 में हुए थे। निर्वाचित समिति का कार्यकाल वर्ष 2018 में समाप्त हो गया, लेकिन उसके बाद से अब तक नए चुनाव नहीं कराए गए हैं।निर्वाचित किसान प्रतिनिधियों के अभाव में मंडियों की व्यवस्था व्यापारियों के प्रभाव में संचालित होती हैं। प्रशासनिक अधिकारी भी प्रभावी हस्तक्षेप नहीं कर पा रहे हैं, जिससे निर्णय प्रक्रिया में किसानों की भागीदारी लगभग समाप्त हो गई है।

मंडी में उपज बेचने आने वाले किसानों की समस्याएं सुनने और उनके हितों की पैरवी करने वाला कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं होने से उनके अधिकार लगातार प्रभावित हो रहे हैं।मंडी सचिव करुणेश तिवारी ने बताया कि कृषि उपज मंडी समिति का कार्यकाल वर्ष 2018 में समाप्त हो चुका है। नए चुनाव कब कराए जाएंगे, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी फिलहाल मंडी प्रशासन के पास नहीं है।

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