सतना : प्रदेश में पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से एक बेहद सुखद खबर सामने आई है . कभी विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके प्रकृति के सबसे बड़े सफाईकर्मी यानी गिद्धों की आबादी में जिले ने नया रिकॉर्ड कायम किया है. हाल ही में संपन्न हुई ग्रीष्मकालीन गणना के अनुसार, सतना अब पूरे मध्य प्रदेश में सबसे अधिक गिद्धों की मौजूदगी वाला जिला बन गया है.
वन विभाग के मुताबिक बेहतर मॉनिटरिंग, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और सटीक ग्राउंड रिपोर्टिंग के चलते यह ऐतिहासिक कामयाबी हासिल हुई है, जिसके कारण विंध्य की पहाड़ियों और जंगलों में अब संकटग्रस्त पक्षियों का कुनबा तेजी से फल-फूल रहा है.
जिले में गिद्धों की संख्या ने वन्यजीव विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है . मई के महीने में हुई समर काउंटिंग के दौरान तीन दिनों का औसत एक हजार एक सौ अठहत्तर गिद्ध प्रतिदिन दर्ज किया गया. इसमें सबसे खास बात यह रही कि 24 मई को अकेले एक ही दिन में एक हजार पांच सौ अड़सठ गिद्ध एक साथ देखे गए, जो कि अब तक का सबसे बड़ा और रिकॉर्ड आंकड़ा माना जा रहा है.
इससे पहले इसी साल फरवरी में हुई विंटर काउंटिंग के दौरान तीन दिनों का औसत सात सौ सत्तावन गिद्ध प्रतिदिन दर्ज किया गया था. फरवरी के मुकाबले मई में आए आंकड़े यह साफ दर्शाते हैं कि जिले में गिद्धों का अनुकूलन और संरक्षण बहुत ही सही दिशा में आगे बढ़ रहा है.
प्रदेश में सामान्य तौर पर गिद्धों की 7 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें तीन प्रवासी और चार स्थानीय प्रजातियां शामिल हैं.
फरवरी की गणना के दौरान पांच प्रजातियां दर्ज की गई थीं, जिनमें इजिप्शियन वल्चर, व्हाइट रम्प्ड वल्चर, किंग वल्चर और लॉन्ग-बिल्ड वल्चर के साथ-साथ सिनेरियस वल्चर नाम की प्रवासी प्रजाति भी शामिल थी. वहीं मई में हुई गणना के दौरान चारों स्थानीय प्रजातियां बहुत बड़ी संख्या में देखी गईं.
इस बार आंकड़ों की सटीकता के पीछे वन विभाग का विशेष वैज्ञानिक प्रशिक्षण रहा है. डीएफओ मयंक चांदीवाल ने बताया कि गणना शुरू होने से पहले वन्यजीव कार्यकर्ता दिलशेर खान के सहयोग से अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई थी.
इस विशेष ट्रेनिंग में वन रक्षक, फॉरेस्ट गार्ड, डिप्टी रेंजर, रेंज ऑफिसर और एसडीओ कार्यालय के अधिकारियों को गिद्धों की सही पहचान, उनकी गणना के वैज्ञानिक तरीके और आम तौर पर होने वाली गलतियों के बारे में विस्तार से समझाया गया था. इसी जमीनी तैयारी का असर रहा कि इस बार गिद्धों की गणना पहले से ज्यादा सटीक और व्यापक तरीके से पूरी हो सकी
जिले गिद्ध संरक्षण के मामले में पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर चुका है.कुछ समय पहले यहां खेत में घायल मिले एक यूरेशियन गिद्ध का रेस्क्यू कर भोपाल में इलाज कराया गया था.बाद में उस पर जीपीएस ट्रैकर लगाया गया, जिसके जरिए उसकी करीब दो हजार तीन सौ किलोमीटर लंबी उड़ान दर्ज की गई थी. यह गिद्ध भारत से उड़कर कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान तक पहुंचा था, जिसने वैश्विक स्तर पर मध्य प्रदेश के संरक्षण कार्यों को बड़ी पहचान दिलाई थी
गिद्धों को प्रकृति का सबसे महत्वपूर्ण सफाईकर्मी माना जाता है क्योंकि ये मृत पशुओं को खाकर वातावरण को स्वच्छ रखते हैं और कई तरह की घातक बीमारियों को फैलने से रोकते हैं. एक समय मवेशियों को दी जाने वाली दवाओं के दुष्प्रभाव के कारण इनकी संख्या तेजी से घट गई थी, लेकिन अब वन विभाग की लगातार निगरानी, रेस्क्यू, इलाज और वैज्ञानिक मॉनिटरिंग के कारण इनकी संख्या में शानदार सुधार देखने को मिल रहा है. जिले में सामने आए नए आंकड़े इस बात का पुख्ता संकेत हैं कि यदि संरक्षण के प्रयास इसी तरह जारी रहे तो आने वाले वर्षों में गिद्धों की आबादी और भी ज्यादा मजबूत हो जाएगी।
